इन वक्तों में कोई नमाज़ न पढ़ी जाए

in waqto me koi namaz na padhi jaye

इन वक्तों में कोई नमाज़ न पढ़ी जाए

  1. सूरज निकलते वक्त 

  2. सूरज डूबते वक्त, हाँ उस दिन की फ़र्ज़ नमाज़ अस्र कुज़ा हो रही हो, तो सूरज डूबते वक्त भी पढ़ी जा सकती है। 

  3. ठीक दोपहर के वक्त, जबकि सूरज बीच सर पर हो। इन तीनों वक्तों में सज्दा-ए-तिलावत भी मना

  4. फज्र की नमाज़ पढ़ लेने के बाद जब तक सूरज अच्छी तरह न निकल जाए। 

  5. अस्र और मगरिब की नमाज़ों के बीच में ।

आख़िर के दोनों वक्त में कोई नफ्ल नमाज़ जायज़ नहीं है, हाँ फ़र्ज़ नमाज़ों की कज़ा पढ़ी जा सकती है और सज्दा-ए-तिलावत करना भी सही है।

जमाअत व इमामत का बयान

जमाअत की बड़ी ताकीद आई है और इसका सवाब बहुत ज़्यादा है यहां तक कि बे जमाअत कि नमाज़ से जमाअत वाली नमाज़ का सवाब २७ गुना है (मिश्कात शरीफ़) 

मसअलाः मर्दो को जमाअत के साथ नमाज़ पढ़ना वाजिब है बिला उज्र एक बार भी जमाअत छोड़ने वाला गुनहगार और सज़ा के लायक है और जमाअत छोड़ने की आदत डालने वाला फ़ासिक है जिसकी गवाही क़बूल नहीं की जायगी और बादशाहे इस्लाम उसको सख़्त सज़ा देगा और अगर पडोसियों ने सुकूत किया तो वह भी गुनहगार होंगे। (रद्दुल मुहतार जिल्द १ सफ़हा ३७१)

मसअलाः जुमअः व ईदैन में जमाअत शर्त है यानी बग़ैर जमाअत यह नमाजें होंगी ही नहीं, तरावीह मे जमाअत सुन्नते किफ़ाया है। यानी मुहल्ला के कुछ लोगो ने जमाअत से पढ़ी तो सबके ज़िम्मा से जमाअत छोड़ने की बुराई जाती रही और अगर सब ने जमाअत छोड़ दी तो सबने बुरा किया। रमज़ान शरीफ में वित्र को जमाअत से पढ़ना मुस्तहब है। सुन्नतों और नफिलों में जमाअत मकरूह है। 

मसअलाः औरतों को किसी नमाज़ में जमाअत की हाज़री जाइज़ नहीं दिन की नमाज़ हो या रात की, जुमअः की हो या ईदैन की, औरत चाहे जवान हो या बुढ़िया यूं ही औरतों को ऐसे मज्मों मे जाना भी नाजाइज़ है जहां औरतो मर्दो का इज्तिमा हो। (दुर्रे मुख़्तार जिल्द १ सफ़हा ३८१)

मसअलाः अकेला मुक्तदी मर्द अगरचे लड़का हो इमाम के बराबर दाहिनी तरफ खड़ा हो। बायें तरफ या पीछे खड़ा होना मकरूह है। दो मुक्तदी हों तो पीछे खडे हों। इमाम के बराबर खडे होना मकरूहे तनज़ीही है। दो से ज्यादा का इमाम के बग़ल मे खड़ा होना मकरूहे तकरीमी है। (दुर्रे मुख़्तार सफ़हा ३८३)

मसअलाः इमाम होने का सबसे ज्यादा हकदार वह शख़्स है जो नमाज़ व तहारत वगैरह के अहकाम सबसे ज्यादा जानता हो फिर वह शख्स जो क़िराअत का इल्म ज़्यादा जानता हो। अगर कई शख्स इन बातों में बराबर हों तो वह शख्स ज़्यादा हकदार है जो ज़्यादा मुत्तकी हो। अगर इस में भी बराबर हों तो ज़्यादा उम्र वाला। फिर जिसके अखलाक ज़्यादा अच्छे हों फिर ज़्यादा तहज्जुद गुज़ार, ग़र्ज कि चन्द आदमी बराबर दर्जे के हों तो उनमें जो शरी हैसियत से फ़ौकियत रखता हो वही ज़्यादा हकदार है। (दुर्रे मुख़्तार जिल्द १ सफ़हा ३७३)

मसअलाः फासिके मोअलिन जैसे शराबी, जिनाकार, जुवारी, सूदखोर, दाढ़ी मुढाने वाला या कटा कर एक मुश्त से कम रखने वाला इन लोगों को इमाम बनाना गुनाह है और इन लोगों के पीछे नमाज़ मकरूहे तहरीमी है और नमाज़ को दोहराना वाजिब है। (दुरे मुख्तार जिल्द १ शफ़हा ३७६) 

मसअलाः राफ़जी , खारजी और दूसरे तमाम बद मज़हबों के पीछे नमाज़ नाजाइज़ व गुनाह है। अगर गलती से पढ़ ली तो फिर से पढ़े। अगर दोबारा नहीं पढ़ेगा तो गुनाहगार होगा।

किराअत का बयान

किराअत यानी कुरआन शरीफ़ पढ़ने मे इतनी आवाज़ होनी चाहिए कि अगर बहरा ना हो और शोर व गुल ना हो तो खुद अपनी आवाज़ सुन सके।अगर इतनी आवाज़ भी ना हुई तो क़िराअत नहीं हुई और नमाज़ न होगी। (दुरे मुख़्तार जिल्द १ सफ़हा ३५६) 

मसअलाः फज्र में और मग़रिब व इशा की पहली दो रकअतों में और जुमअः व ईदैन व तरावीह और रमज़ान की वित्र मे इमाम पर जहर के साथ क़िराअत करना वाजिब है और मग़रिब की तीसरी रकअत में और इशा की तीसरी और चौथी रकअत में और जुहर व अस्र की सब रकअतों में आहिस्ता पढ़ना वाजिब है।  

मसअलाः जहूर के यह मानी है कि इतनी जोर से पढ़े कि कम से कम सफ मे करीब के लोग सुन सके और आहिस्ता पढने के यह मानी है कि कम से कम खुद सुन सके । (दुर्दै मुख्तार जिल्द १ सफ़हा ३५८)

मसअलाः जहरी नमाज़ों में अकेले को इख़्तियार है चाहे ज़ोर से पढ़े चाहे आहिस्ता मगर ज़ोर से पढ़ना अफज़ल है। (दुर्रे मुख़्तार सफ़हा ३५८) मसअलाः कुरआन शरीफ़ उलटा पढ़ना मकरूहे तहरीमी है मसलन यह कि पहली रकअत मे कुल हुवल्लाह और दूसरी मे तब्बत यदा पढ़ना। (दुरै मुख्तार सफ़हा ३७६) 

मसअलाः कुरआन शरीफ़ उलटा पढ़ना मकरूहे तहरीमी है मसलन यह कि पहली रकअत मे कुल हुवल्लाह और दूसरी मे तब्बत यदा पढ़ना। (दुर्रे मुख्तार सफ़हा ३७६)

मसअलाः दरमियान में एक छोटी सूरह छोड़ कर पढ़ना मकरूह है जैसे पहली में कुल हुवल्लाह और दूसरी मे कुल अऊजु बि रब्बिन्नास पढ़ी और दरमियान में सिर्फ एक सूरह कुल अऊजु बि रब्बिल फ़लक० छोड़ दी लेकिन हां अगर दरमियान की सूरह पहले से बड़ी हो तो दरमियान में एक सूरह छोड़कर पढ़ सकता है। जैसे ‘वत्तीन’ के बाद “इन्ना अन्ज़लनाहु’ पढ़ने में हर्ज नहीं और ‘इज़ा जा-अ’ के बाद ‘कुल हुवल्लाह’ पढ़ना नही चाहिए। (दुर्रे मुख़्तार जिल्द १ सफ़हा ३६८)

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नमाज़ का तरीक़ा
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