तरावीह की नमाज़

taraweeeh ki namaz

तरावीह की नमाज़

तरावीह मर्द व औरत सब के लिये सुन्नतए-मौअक्क्दा है। रमज़ान में इशा के फ़र्ज़ और सुन्नतें पढ़ने के बाद २० रक्अतें तरावीह की पढ़ना हर आदमी के लिए सुन्नत है। तरावीह के लिये, पहले इशा की नमाज़ पढ़ना जरूरी है। जमाअत में दो-दो रक्अतें करके तरावीह पढ़नी चाहिएं। हर चार रक्अतों के बाद कुछ देर सुस्ता लेना चाहिए। तरावीह की क़ज़ा नहीं यानी अगर छूट गई तो नहीं पढ़ सकते। इस बीच नीचे लिखी दुआ पढ़ते रहें। इस दुआ का नाम ‘तस्बीहे तरावीह’ है।

दुआ

सुब्हा-न ज़िल मुल्कि वल-म-ल-कूति सुब्हा-न ज़िल अिज्ज़ति वल अज़मति वल हैबति वल कुद् रति वल् किब्रियाई वल-ज-ब रुति सुब्हानल-मलिकिल’ हय्यिल्ल्ज़ी ला यनामु व ला यमूतु सुब्बूहुन कुद् दूसुन रब्बुना व रब्बुल मलाइकति वरूहि अल्लाहहुम-म अजिर्ना मिनन्नारि या मुजीरू या मुजीरू या मुजीरू०

तर्जुमा: पाक है वह ज़मीन की बादशाही और आसमान की बादशाही वाला, पाक है वह इज्ज़त और बुजुर्गी और हैबत और कुदरत वाला और बड़ाई और दब दबे वाला। पाक है बादशाह (हक़ीक़ी) ज़िन्दा, जो सोता नहीं और न मरेगा, बहुत पाक और बहुत ही मुक़द्दस हमारा परवरदिगार और फ़रिशतों और रूह का परवरदिगार। ऐ अल्लाह! हमको दोज़ख से पनाह दे, ऐ पनाह देने वाले! ऐ पनाह देने वाले! ऐ पनाह देने वाले!

तरावीह की बीस रक्अतों के बाद वित्र भी जमाअत से पढ़ने चाहिएं। तरावीह बैठ कर पढ़ना मकरूह है। अगर तरावीह की कुछ रक्अतें बाक़ी रह गयीं और वित्र के लिए जमाअत खड़ी हो गयी, तो तरावीह की बाक़ी रक्अतें, जमाअत के साथ वित्र पढ़ने के बाद पढ़ी जा सकती हैं। तरावीह में पूरा कुरआन मजीद एक बार में ख़त्म करना सुन्नत-ए-मौअक्क्दा है।

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