नफ़्ली नमाजें

nafli namaze

नफ़्ली नमाजें

तहज्जुद की नमाज़

इस नमाज़ का वक़्त आधी रात के बाद सुबहे सादिक़ से पहले तक है। तहज्जुद की नमाज़ कम से कम दो और ज्यादा से ज्यादा १२ रक्’अतों की होती है। फ़र्ज़ नमाज़ के बाद सबसे अच्छी नमाज़ रात की नमाज़ (तहज्जुद) की नमाज़ है। इस नमाज़ के फ़ायदे बे-अन्दाज़ा हैं। जहां तक मुम्किन हो, इसे छोड़ना न चाहिए। जो आयतें या सूरतें याद हों, पढ़ लिया करें, कोई सूर: या आयत इसके लिए खास नहीं है।

इशराक़ की नमाज़

जब सूरज उंचा हो जाये और उसकी ज़र्दी दूर हो जाए, तो चार रक्अत नमाज़ इशराक़ पढ़ी जाती है। 

हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया-” जो शख़्स नमाज़-ए-फ़ज़ बाजमाअत अदा करे, फिर (अपनी जगह पर) बैठकर सूरज तुलुअ होने तक अल्लाह का ज़िक्र करता रहे। फिर 2 रक्अत (इशराक की) नमाज़ पढ़े, तो उसे कामिल हज और उमरा का सवाब मिलता है.”। 

हज़रत हसन बिन अली रजि.से नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का इरशाद नक़ल किया गया है, जो शख़्स फ़ज़ की नमाज़ पढ़कर सूरज निकलने तक अल्लाह तअला के ज़िक्र में मशगूल रहता है। फिर दो या चार रक्त (इशराक की नमाज़) पढ़ता है, तो उसकी खाल को भी दोज़ख़ की आग न छुएगी।

नमाज़े जुहा यानी चाश्त की नमाज़

चाश्त की नमाज़ का सही वक़्त आफ़ताब के खूब तलू हो जाने पर शुरू होता है. चाश्त में कम से कम दो और ज़्यादा से ज़्यादा 12 रक्अत पढ़ी जाती हैं। 

नौ-दस बजे के वक़्त आठ रक्अत नमाज़ नफ़्ल पढ़िए। ज़वाल बाद पढ़ें तो चार रकअतें पढ़िए, इसको नमाज़े ज़वाल भी कहते हैं। जो कोई चास्त की नमाज़ का पाबन्द होगा वो कभी मुफ़िलस ना होगा।

नमाज़ अव्वाबीन

मगरिब की तीन रक्अत फ़र्ज पढ़ने के बाद, छः रक्अतें नफ़ल एक ही नियत से पढ़े। इन का नाम सलातुल अव्वाबीन है, हर दो रक्त पर कायदा कीजिये और इस मे अत्तहियात, दुरुद ए इब्राहीम ओर दुआ पढ़े। पहली, तीसरी, और पांचवीं रक्त की इब्तिदा मे सना, तौज़ ओ तसमिआ भी पढ़े। छठी रक्अत के कायदे के बाद सलाम फेर दिजिये। पहली दो रक्त सुन्नत ए मोआक्कदा है और बाकी चार नवाफ़िल। ये है अव्वाबीन यानी तोबा करने वालो की नमाज। हर दो रक्अत पे सलाम पढ़ना अफ़जल है।

हाजत की नमाज़

अगर आपको कोई भी जायज़ जरूरियात पेश आ जाये तो ये नमाज़ पढ़ सकते हैं। मर्द चाहे तो मस्जिद या घर मे भी पढ़ सकते हैं। ख्वातीन घर मे ही अदा करें। यह नमाज़ रसूले अकरम सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने एक अंधे को सिखायी, वह आंखो में रोशनी वाले हो गए। किसी भी बेहतर वक़्त ये सलातुल हाजत की नमाज़ अदा कर सकते है।

अच्छी तरह से वजू बना लीजिए। अपने मक़सद की नियत कर लीजिए। फिर जैसे पंज वक्ता नमाज़ की नियत करते है ठीक वैसे ही नियत करनी है बस “नीयत करता/करती हु मैं 2 रक़अत सलातुल-हाजत की” बोलना है। 

जो भी सूरह याद हो वो पढ़ लीजिए और इस तरह से 2 रक़ अत पूरी कर लीजिए; फिर इसके बाद खूब दिल से अल्लाह की ही हम्द-ओ-सनाह (अल्लाह की तारीफ कीजिये अल्लाह के नामो से और जो भी आयात आपको याद हो वो) पढ़िए;

उसके बाद हुजूर-ए-अकरम सल्लल्लाहो आलेही वसल्लम पर दुख्द शरीफ पढ़ कर सवाब पहुँचाए। कोई भी दुरूद-ए-पाक जितनी भी मरतबा आप पढ़ना चाहे पढ़ सकते है;

फ़िर यह दु’आ एक मरतबा पढ़िए

अल्लाहुम-म इन्नी अस्अलु-क वअ-त-वस्सलु व अ-त-वज्जहु इलैक बिनबीयि-क मुहम्मदिन नबी यिर्र पति या रसूलल्लाहि इन्नी क्दतब्ज हुतो बि-क इला रब्बी फ़ी हाजती हाज़िही लेतुक् जा ली ललहुम्मा फ़सफ़िअ हू फ़ी

और फिर दिल से रो-रो कर अल्लाह से अपने मक़सद की दु’आ कीजिये;

नमाज़े तस्बीह

इसका तरीका यह है कि ‘अल्लाहु अक्बर’ कह कर सना ‘ला इला-ह गौरुक’ तक पढ़िए, फिर सुब्हानल्लाहि वल्-हम्दु लिल्लाहि वला इलाह इल्लल्लाहु वल्लाहु अक्बर: १५ बार, फिर तअव्वुज़, तस्मिया, सूर: फ़ातिहा और कोई सूर: पढ़ कर दस

बार यही तस्बीह पढ़िए, फिर रुकूअ कीजिए, रुकूअ में यह तस्बीह दस बार पढ़िए, फिर रुकूअ से सर उठाइए और तस्मीअ व तहमीद के बाद यह तस्बीह दस बार पढ़िए, फिर सज्दे में जाइए और दस बार पढ़िए, फिर सज्दे से सर उठा कर दस बार पढ़िए, फिर दुसरे सज्दे में जाइए और दस बार पढ़िए, इसी तरह चार रक्अत पढ़िए। हर रक्अत में १५ बार तस्बीह पढ़ी जाती है और चार रक्तों में इसकी गिनती तीन सौ बार होती है।

याद रखिए रुकूअ और सज्दे में ‘सुब्हा-न रब्बियल अज़ीम’ ‘सुब्हा-न रब्बियल आला’ कहने के बाद ये तस्बीबात पढ़िए। इसकी पहली रकअत में ‘अल हाकुमुत्तकासुर’, दूसरी में वल अस, तीसरी में सूरः काफिरून और चौथी में ‘कुल हुवल्लाह’ पढ़िए। अगर कुरआन का हाफ़िज़ हो, सूरः हदीद, सूर: हशर, सूर: सफ्फ़ और सूर: तगाबुन पढ़िए।

हर गैर-मकरूह समय में यह नमाजे तस्बीह पढ़ सकते हैं और अच्छा यह है कि जुह से पहले पढ़िए। हो सके तो रोज़ पढ़िए, या महीने में एक बार, या साल में एक बार और यह भी न हो सके तो उम्र में एक बार पढ़िए।

इन नमाज़ को मकरुह वक्त के अतिरिक्त कभी भी पढ़ सकते हैं।

नमाजे इस्तिस्का का बयान

अगर बारिश न हो (सूखा पड़ जाए) तो दो रकअत नफ्ल नमाज़ पढ़कर तौबा व माफ़ी मांग कर दुआ करें। जिसका तरीका इस प्रकार है: दो रकअत नफ्ल नमाज़ की नियत से इमाम नमाज़ पढ़ाएगा जिसमें गाँव या शहर के सभी लोग शामिल होंगे फिर नमाज़ के बाद इमाम खुत्वः देगा और अपनी चादर (रूमाल) को उल्टे एक सिरे से दसरे सिरे की तरफ़ । फिर अल्लाह से माफ़ी मांगे और बारिश की दुआ करे।

नमाजे कुसूफ का बयान

सूरज ग्रहण के वक्त जो नमाज़ पढ़ी जाती है उसे कुसूफ की नमाज़ कहते हैं। यह दो रकअत नफ्ल नमाज़ पढ़ी जाती है। इमाम के पीछे पढ़े अथवा खुद पढ़े। इसका तरीका इस प्रकार है: जब सूरज ग्रहण हो तो इमाम दो रकअत नफ्ल नमाज़ इस तरह पढ़ाये कि किरअत खूब देर तक करे और फिर नमाज़ को ख़त्म करके दुआ करे, यहाँ तक कि ग्रहण ख़त्म हो जाए।

नमाजे खुसुफ का बयान

नमाज़े खुसूफ़ चाँद ग्रहण पर पढ़ी जाने वाली नमाज़ को कहते हैं यह नमाज़े कुसूफ की तरह पढ़ी जाती है। अन्तर केवल यह है कि जमाअत से नहीं पढ़ी जाती, बल्कि दो रकअत नफ्ल की नियत से अलग-अलग पढ़ी जाती है।

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नमाज़ का तरीक़ा
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