पैगंबर इस्माईल अलैहिस्सलाम की कहानी

हज़रत इस्माईल

पैगंबर इस्माईल अलैहिस्सलाम की कहानी

हज़रत इस्माईल (अ.स) की पैदाइश

हज़रत इब्राहीम (अ.स) ने मिस्र से वापसी पर फ़लस्तीन में रिहाइश इख़्तियार की। इस इलाके को ‘कनआन‘ भी कहा जाता है।

….. हजरत इब्राहीम (अ.स) उस वक्त तक औलाद से महरूम थे। हजरत इब्राहीम (अ.स) ने अल्लाह की बारगाह में बेटे के लिए दुआ की और अल्लाह ने उनकी दुआ को कुबूल फ़रमा लिया और उनको तसल्ली दी। यह दुआ इस तरह कुबूल हुई कि हजरत इब्राहिम (अ.स) की छोटी बीवी मोहतरमा हजरत हाजरा (र.) गर्भवती हुईं।

कुरआन में हज़रत इस्माईल का चर्चा:

हज़रत इस्माईल (अ.स) का जिक्र कुरआन मजीद में कई बार हुआ है। सूरः मरयम में उनके नाम के साथ उनके औसाफ़े जमीला का भी जिक्र किया गया है।

बाप [इब्राहीम (अ.स)] और बेटे [इस्माईल (अ.स)] की क़ुरबानी:

अल्लाह के मुकर्रब बन्दों को इम्तिहान व आजमाइश की सख्त-से-सख्त मंजिलों से गुजरना पड़ता है। पहली मंज़िल वह थी जब इब्राहीम (अ.स) को आग में डाला गया, तो उस वक्त उन्होंने जिस सब्र और अल्लाह के फैसले पर राजी होने का सबूत दिया, वह उन्हीं का हिस्सा था। इसके बाद जब इस्माईल को और हाजरा को फारान के बयाबान में छोड़ आने का हुक्म मिला, तो वह भी मामूली इम्तिहान न था। अब एक तीसरे इम्तिहान की तैयारी है जो पहले दोनों से भी ज़्यादा हिला देने वाला और जान लेने वाला इम्तिहान है, यही कि हजरत इब्राहीम तीन रात बराबर ख़्वाब देखते हैं कि अल्लाह तआला फ़रमाता है कि ‘ऐ इब्राहीम! तू हमारी राह में अपने इकलौते बेटे की कुरबानी दे।’

फिर जब इस्माईल अपने बाप के साथ दौड़ धूप करने लगा तो (एक दफा) इबराहीम ने कहा बेटा खू़ब मैं (वही के ज़रिये क्या) देखता हूँ कि मैं तो खु़द तुम्हें जि़बाह कर रहा हूँ तो तुम भी ग़ौर करो तुम्हारी इसमें क्या राय है इसमाईल ने कहा अब्बा जान जो आपको हुक्म हुआ है उसको (बे तअम्मुल) कीजिए अगर खु़दा ने चाहा तो मुझे आप सब्र करने वालों में से पाएगे [सूरए अस साफ़्फ़ात :102]

नबियों का ख्वाब ‘सच्चा ख्वाब’ और वह्य इलाही होता है, इसलिए इब्राहीम रजा व तस्लीम बनकर तैयार हो गए कि अल्लाह के हुक्म की जल्द से जल्द तामील करें, चूंकि यह मामला अकेली अपनी जात से मुताल्लिक न था, बल्कि इस आज़माइश का दूसरा हिस्सा वह ‘बेटा’ था, जिसकी कुरबानी का हुक्म दिया गया था, इसलिए बाप ने अपने बेटे को अपना ख्वाब और अल्लाह का हुक्म सुनाया, बेटा इब्राहीम जैसे नबी और रसूल का बेटा था, तुरन्त हुक्म के आगे सर झुका दिया और कहने लगा, अगर अल्लाह की यही मर्जी है, तो इन्शाअल्लाह आप मुझको सब्र करने वाला पाएंगे।

इस बात-चीत के बाद बाप-बेटे अपनी कुरबानी पेश करने के लिए जंगल रवाना हो गए। बाप ने बेटे की मर्जी पाकर जिब्ह किए जाने वाले जानवर की तरह हाथ-पैर बांधे, छुरी को तेज किया और बेटे को पेशानी के बल पछाड़ कर जिब्ह करने को तैयार हो गए, फौरन अल्लाह की वह्य इब्राहीम अलैहि सलाम पर नाजिल हुई, ‘ऐ इब्राहीम! तूने अपना ख्वाब सच कर दिखाया। बेशक यह बहुत सख्त और कठिन आजमाइश थी।‘ अब लड़के को छोड़ और तेरे पास जो यह मेंढा खड़ा है, उसको बेटे के बदले में जिब्ह कर, हम नेकों को इसी तरह नवाज़ा करते हैं। इब्राहीम अलैहि सलाम ने पीछे मुड़कर देखा तो झाड़ी के करीब एक मेंढा खड़ा है। हज़रत इब्राहीम अलैहि सलाम ने अल्लाह का शुक्र अदा करते हुए उस मेंढे को जिब्ह किया।

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काबा की बुनियाद:

हज़रत इब्राहीम अलैहि सलाम अगरचे फ़लस्तीन में ठहरे थे, मगर बराबर मक्का में हाजरा और इस्माईल अलैहि सलाम को देखने आते रहते थे। इसी बीच इब्राहीम अलैहि सलाम को अल्लाह का हुक्म हुआ कि ‘अल्लाह के काबे‘ की तामीर करो। हज़रत इब्राहिम अलैहि सलाम ने हज़रत इस्माईल अलैहि सलाम से जिक्र किया और दोनों बाप-बेटों ने अल्लाह के घर की तामीर शुरू कर दी।

एक रिवायत के मुताबिक बैतुल्लाह की सबसे पहली बुनियाद हज़रत आदम अलैहि सलाम के हाथों रखी गई और अल्लाह के फ़रिश्तों ने उनको वह जगह बता दी थी, जहां काबे की तामीर होनी थी, मगर हजारों साल के हादसों ने अर्सा हुआ उसको बे-निशान कर दिया था, अलबत्ता अब भी वह एक टीला या उभरी हुई जमीन की शक्ल में मौजूद था। यही वह जगह है, जिसको अल्लाह की वस्य ने इब्राहीम अलैहि सलाम को बताया और उन्होंने इस्माईल अलैहि सलाम की मदद से उसको खोदना शुरू किया तो पिछली तामीर की बुनियादें नज़र आने लगीं। इन्हीं बुनियादों पर बैतुल्लाह की तामीर की गई, अलबत्ता कुरआन पाक में पिछली हालत का कोई तज़किरा नहीं है।

दूसरी तरफ़ यह हक़ीक़त है कि इस तामीर से पहले तमाम कायनात और दुनिया के कोने-कोने में बुतों और सितारों की पूजा के लिए हैकल और मन्दिर मौजूद थे, पर इन सबके उलट सिर्फ एक ख़ुदा की परस्तिश और उसकी यकताई के इकरार में सरे नियाज़ झुकाने के लिए दुनिया के बुतकदों में पहला घर जो ख़ुदा का घर कहलाया, वह यही बैतुल्लाह है।

इसी तामीर को यह शरफ हासिल है कि इब्राहीम जैसा पैग़म्बर उसका मेमार है और इस्माईल जैसा नबी व जबीह उसका मजदूर बाप-बेटे बराबर उसकी तामीर में लगे हुए हैं और जब उसकी दीवारें ऊपर उठती हैं और बुजुर्ग बाप का हाथ ऊपर तामीर करने से माजूर हो जाता है तो कुदरत की हिदायत के मुताबिक एक पत्थर को बाड़ बनाया जाता है, जिसको इस्माईल अलैहि सलाम अपने हाथ से सहारा देते और इब्राहीम अलैहि सलाम उस पर तामीर करते जाते हैं। यही वह यादगार है जो ‘मकामे इब्राहीम‘ से जाना जाता है। जब तामीर इस हद पर पहुंची, जहां आज हजरे अस्वद नसब है तो जिब्रील अमीन ने उनकी रहनुमाई की और हजरे अस्वद को उनके सामने एक पहाड़ी से महफूज निकाल कर दिया, जिसको जन्नत का लाया हुआ पत्थर कहा जाता है, ताकि वह नसब कर दिया जाए।

अल्लाह का घर तामीर हो गया तो अल्लाह तआला ने इब्राहीम अलैहि सलाम को बताया कि यह मिल्लते इब्राहीमी के लिए (किबला) और हमारे सामने झुकने का निशान है, इसलिए यह तौहीद का मर्कज़ करार दिया जाता है। तब इब्राहीम व इस्माईल अलैहि सलाम ने दुआ मांगी कि अल्लाह तआला उनको और उनकी जुर्रियत (आल औलाद) को नमाज़ और जकात कायम करने की हिदायत दे और इस्तिकामत बरते और उनके लिए फलों, मेवों और रिज़क में बरकत दे और दुनिया के कोने कोने में बसने वाले गिरोह में से हिदायत पाए हुए गिरोह को इस तरफ़ मुतवजह करे कि वे दूर-दूर से आएं और हज के मनासिक अदा करें और हिदायत व रुश्द के इस मर्कज में जमा होकर अपनी जिंदगी की सआदतों से दामन भरें।

हज़रत इस्माईल की वफ़ात:

हज़रत इस्माईल अलैहि सलाम की उम्र जब एक सौ छत्तीस साल की हुई, तो उनका इंतिक़ाल हो गया, तारीखी रिवायात के मुताबिक़ हज़रत इस्माईल अलैहि सलाम की वफ़ात फलस्तीन में हुई और फ़लस्तीन ही में उनकी क़ब्र बनी। अरब तारीख के माहिरों के मुताबिक वह और उनकी वालिदा हाजरा बैतुल्लाह के क़रीब हरम के अन्दर दफ़न हैं। वल्लाहु आलम।

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