पैगंबर सालेह (अ.स)  की कहानी

पैगंबर सालेह (अ.स) की कहानी

पैगंबर सालेह (अ.स) की कहानी

कौम ए आद की हलाकत के बाद, हज़रत हूद (अ.स) के साथ जो लोग महफूज रहे, उन्ही की नस्लों को कौम ए समूद कहते हैं।

कौम आद की तरह समुद कौम भी पहाड़ों को काटकर खुबसूरत इमारत बनाने में माहिर थी, ये हुनर उन्हें विरासत में (कौम ए आद) से मिली थी। अपने इस हुनर के घमंड और शैतान के वस्वसे में आकर कौम ए समुद शरकाश और बुतपरस्ती में मुबतला हो गई। फिसको फुजुर का दौर आम हो गया तब अल्लाह तआला ने हजरत सालेह (अ.स) को उस कौम की तरफ भेजा।

और याद करो जब अल्लाह ने आद के पश्चात तुम्हें उसका उत्तराधिकारी बनाया और धरती में तुम्हें ठिकाना प्रदान किया। तुम उसके समतल मैदानों में महल बनाते हो और पहाड़ों को काट-छाँट कर भवनों का रूप देते हो। अतः अल्लाह की सामर्थ्य के चमत्कारों को याद करो और धरती में बिगाड़ पैदा करते न फिरो।” [सूरह अल आराफ: 74]

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समूद की बस्तियां

समूद की आबादियां हिज्र में थी। हिंजाज़ और शाम के दर्मियान वादी कुरा तक जो मैदान नज़र आता है, यह सब उनके रहने की जगह है। समूद की बस्तियों के खंडर और निशान आज तक मौजूद हैं। इनकी ख़ास बात यह है कि इन बस्तियों में मकान पहाड़ों को काट कर बनाए गए थे, गोया समूद तामीरात के मामले में बहुत ज़्यादा निपुण थे।

समूद का ज़माना

समूद के ज़माने के मसले के बारे में कोई तै शुदा बाक़ायदा वक्त नहीं बताया जा सकता, अलबता यकीनी तौर पर कहा जा सकता है कि इनका जमाना हज़रत इब्राहीम (अ.स)  से पहले का ज़माना है।

समूदियों का मज़हब

समूद अपने बुतपरस्त पुरखों की तरह बूतपरस्त थे। वे ख़ुदा के अलावा बहुत से बातिल माबूदों के मानने वाले थे और शिर्क में डूबे हुए थे। इसलिए उनकी इस्लाह के लिए भी और उनपर हक़ वाजेह करने के लिए भी उन्ही के कबीले में से हजरत सालेह (अ.स) को नसीहत करनेवाला पैगम्बर और रसूल बनाकर भेजा, ताकि वह उनको सीधे रास्ते पर लाये, उनपर वाजेह करे की कायनात की हर चीज़ अल्लाह के एक होने और अकेले होने पर गवाह है। उन्हें अल्लाह के आशीर्वादों की याद दिलाएं और उन्हें बताएं कि अल्लाह के अलावा कोई और पूजा के योग्य नहीं है।

सालेह (अ.स) की दावत

नबूवत मिलने से पहले भी हज़रत सालेह (अ.स) बहुत इल्म वाले थे और एक ऊँचे घराने से थे। अपने मामले में लोग उनसे मशवरे लिया करते थे।

जब हज़रत सालेह (अ.स) कौम को एक अल्लाह पर ईमान लाने और उसके सिवा किसी और की इबादत न करने की दावत दी, तो उनहोने उनका उनका साथ छोड़ दिया और उनकी बात मानने से साफ़ इनकार कर दिया। उनके इनकार के बावजूद भी हज़रत सालेह (अ.स) लगातार दावत देते रहे और एक अल्लाह की तरफ बुलाते रहे।

सिर्फ चंद गरीब व कमजोर लोग ही आप पर ईमान लाये बाकी सब मुन्किर हुए।

कौम के सरदारों का मुतालबा -

कौम समुद के सरदारों ने हज़रत सालेह (अ.स)  के सामने एक शर्त रखी, और कहा अगर आप कोई चमत्कार दिखाओ तो हम मान लेंगे की आप अल्लाह के नबी हो और आपका पैग़ाम सच्चा है कौम समुद के सरदारों ने कहा चमत्कार हमारे मुताबिक़ दिखाना होगा उसके बाद उन लोगों ने कहा की अगर इस पहाड़ में से एक लम्बी चौड़ी ऊंटनी दस महीने की गाभिन पैदा हो और उसके बाद उस ऊंटनी से एक उसका बच्चा पैदा हो जो तंदुरुस्त और लम्बा हो तब हम इस चमत्कार को देख कर आप पर ईमान जरूर लायेंगे और तब हर मामले में हज़रत सालेह (अ.स) की फरमाबरदारी करेंगे।

मगर क़ौम के सरदार और बड़े-बड़े सरमायादार उसी तरह बातिल-परस्ती पर क़ायम रहे और उन्होंने दी हुईं हर किस्म की नेमतों का शुक्रिया अदा करने के बजाए नाशुक्री का तरीक़ा अपना लिया। वे हज़रत सालेह (अ.स) का मज़ाक़ उड़ाते हुए कहा करते कि ‘सालेह (अ.स) अगर हम बातिल परस्त होते, अल्लाह के सही मज़हब के इंकारी होते और उसके पसंदीदा तरीक़े पर कायम न होते, तो आज हमको यह सोने-चांदी की बहुतायत, हरे-भरे बाग और दूसरी नेमते हासिल न होतीं। तुम ख़ुद को और अपने मानने वालों को देखो ओर फिर उनकी तंगहाली, और गरीबी पर नज़र करों और बतलाओ कि अल्लाह के प्यारे और मकबूल कोन हैं?

हज़रत सालेह (अ.स) फ़रमाते कि ‘तुम अपने इस ऐश और अमीरी पर शेखी न मारो और अल्लाह के सच्चे रसूल और उसके सच्चे दीन का मज़ाक न उड़ाओ, इसलिए अगर तुम्हारे घमंड और दुश्मनी का यही हाल रहा, तो पल में सब कुछ फ़ना हो जाएगा और फिर न तुम रहोगे और न यह तुम्हारा समाज, बेशक ये सब अल्लाह की नेमते हैं, बशर्ते कि इनके हासिल करने वाले उसका शुक्र अदा करें और उसके सामने सर नियाज़ झुंकाएं और बेशक यही अज़ाब व लानत के सामान हैं, अगर इनका इस्तिक़बाल शेख़ी व गुरूर के साथ किया जाए। इसलिए यह समझना गलती है कि ऐश का हर सामान अल्लाह की खुश्नूदी का नतीजा है।’

समूद को यह हैरानी थी कि यह कैसे मुमकिन है कि हमीं में का एक इंसान अल्लाह का पैगम्बर बन जाए और वह अल्लाह का हुक्म सुनाने लगे। वे बड़े ताज्जुब से कहते –

“कि हमारी मौजूदगी में उस पर (खुदा की) नसीहत उतरती है।’ [साद 38:8]

यानी अगर ऐसा होना ही था तो इसके योग्य हम थे, न कि सालेह (अ.स) और कभी अपनी क़ौम के कमज़ोर लोगों (जों कि मुसलमान हो गए थे) को खिताब करके कहते –

“क्‍या तुमको यकींन है कि बिना शक के सालेह अपने परवरदियार का रसूल है?’ [अल-अराफ़ 7:59]

और मुसलमान जवाब देते –

“बेशक हम तो इसके लाये हुए पैगाम पर ईमान रखते है।’ [अल-अराफ़ 7:75]

अल्लाह की ऊटनी

हज़रत सालेह (अ.स)  ने पहाड़  को हुक्म दिया और अचानक पहाड़ को चीरते हुए एक बहुत लम्बी चौड़ी और दस महीने की गाभिन ऊँटनी बाहर निकल आई।पहाड़ में से उसी तरह की ऊँटनी निकली, जैसी उस क़ौम के लोगों ने मांगी थी। हज़रत सालेह (अ.स)  का ये चमत्कार देखते ही समूद क़ौम के लोग आश्चर्य में पड़ गये। फिर उस ऊँटनी से एक बच्चा भी उसी कद और डील-डोल का पैदा हुआ। यह हज़रत सालेह (अ.स)  का बहुत बड़ा चमत्कार था जो अल्लाह की कुदरत से ज़ाहिर हुआ था।

इब्ने उमर इस चमत्कार को देखकर मुसलमान हो गया, दूसरे सरदारों का दिल भी ईमान की तरफ आकर्षित हो गया। लेकिन जो पुराने और घाघ लोग थे, उन्होंने कहा कि यह सालेह तो बहुत बड़ा जादूगर है। यह नुबुव्वत का चमत्कार नहीं, बल्कि जादू का जोर है इस तरह जिनके दिलों में ईमान की किरन फूटने वाली थी, वे फिर इन बातों से गुमराही के अंधेरे में चले गये। इस तरह उन्होंने अपना अंजाम तबाही के रास्ते पर डाल दिया।

क़ुरआन मजीद ने इसे “नाकतुल्लाह” (अल्लाह की ऊंटनी) कहा है, ताकि यह बात नज़रों में रहे कि यूं तो तमाम मख़लूक़ अल्लाह ही की मिल्कियत है, मगर समूद ने चूंकि उनको ख़ुदा की एक निशानी की शक्ल में तलब किया था, इसलिए उसकी मौजूदा अच्छाई ने उसको “अल्लाह की निशानी” का उपाधि दिलाया, साथ ही उसको ‘लकुम आयातिही’ (तुम्हारे लिए निशानी) कहकर यह भी बताया कि यह निशानी अपने भीतर ख़ास अहमियत रखती है।

हज़रत सालेह (अ.स)  अभी भी अपनी क़ौम को समझाते, सीधा-सच्चा रास्ता दिखाते मगर उस क़ौम पर शैतान इस तरह हावी हो चूका था की वो लोग हज़रत सालेह (अ.स)  को झूठा कहते और रात-दिन खुदा की नाफरमानी करते, हज़रत सालेह (अ.स)  ने उन लोगों से ऊँटनी के बारे में कहा- देखो! इस ऊँटनी की ज़िन्दगी से तुम्हारी ज़िन्दगी है और इसकी परेशानी से तुम्हारी परेशानी है। यहाँ यह बताता चलूं  कि उस ऊँटनी की ख़ुराक़ बहुत ही ज़्यादा थी। जब भी पानी पीती तो एक बार में जितना पानी उसके सामने लाया जाता वो सब पी जाती थी। अल्लाह तआला ने उस क़ौम के लोगों के लिए हुक्म दिया की एक दिन का पानी तुम लोग पियो और एक दिन का पानी वो ऊँटनी पीयेगी और उस दिन तुम लोग उस ऊँटनी का दूध पी सकते हो।

ऊंटनी का क़त्ल कर दिया जाना

इस बात पर सभी खुश हुए, मगर कुछ लोगो को दुख हुआ। जब ऊंटनी अपनी बारी पर पानी पीने के लिए कुएँ पर जाती तो पूरा पानी एक ही बार में पी जाती, यह अलग बात है कि वह जितना पानी पीती थी, उसी के मुताबिक उतना दूध भी देती थी कि पूरे क़ौम के बर्तन दूध से भर जाते। ऊंटनी की शक्ल बहोत लम्बी थी, भारी भरकम जिस्म, शक्ल-सुरत, सब कुछ हज़रत सालेह (अ.स)  के मोजिज़े की जबरदस्त दलील थी।

इमाम नसई ने लिखा है कि उसके जिस्म की लम्बाई सौ गज थी और उसके पांव की ऊंचाई डेढ सौ गज थी जब वो ऊंटनी जंगल में चरने के लिए जाती, तो जंगल के दूसरे जानवर उस ऊंटनी को देखकर डर जाया करते और उससे दूर भागते थे और जब वो ऊंटनी गांव में मौजूद होती थी, तो गाँव के सभी जानवर भाग कर जंगल में  पनाह लेते। नतीजा ये हुआ की जिन गाँव के लोगों के पास ज़्यादा जानवर थे वो लोग जानवरों की इस भागम-भाग से बहुत परेशान हो गए, यहाँ तक कि वह लोग ऊंटनी को मार डालने की बात सोचने लगे।

अल्लाह ने हज़रत सालेह (अ.स)  पर वही भेजी कि अपनी कौम से कहो कि इस ऊंटनी को कत्ल करने की बात न सोचें और खुदा के हुक्म के खिलाफ उसको न सताएं, वरना उसकी मौत तुम सब की मौत की वजह बनेगी, तुम खुदा के अज़ाब के शिकार होगे, फिर मोहलत खत्म हो जाने के बाद तुम पर न उसकी कोई मेहरबानी होगी, न उसे तुम लोगों पर तरस आयेगा। उस कौम में एक बुढ़िया थी उस बुढ़िया के पास माल और बकरियां और ऊंट भी बहोत थी।

इसी तरह एक बे-दीन औरत थी जो बहुत अमीर थी। लेकिन उस औरत के शौहर ईमान वाले थे। इन दोनों औरतों ने वहां के सरदारों को ऊंटनी को मारने के लिये तैयार किया और कीदार बिन सालिफ और मस्ऊद बिन महदज को बुलाया । उस बुढ़िया ने कीदार से अपनी बेटी का निकाह कर देने का वादा किया और उसे कुछ नकद और अनाज देकर यह तय करा लिया कि ऊंटनी को मारना है।

वे दोनों मल्ऊन सात आदमियों को साथ लेकर रास्ते में बैठे और ऊंटनी का इंतिज़ार करने लगे। जिस वक्त वह ऊंटनी निकली, पहले मस्ऊद ने उसको तीरों से मार कर घायल कर दिया, फिर कीदार ने उसके पाँवों को जख्मी किया, यहाँ तक कि इन सातों ने अल्लाह की निशानी उस ऊंटनी को जान से मार डाला। इस तरह उन ज़ालिमों ने अपनी बर्बादी का रास्ता खुद ही पैदा कर दिया। ऊंटनी का बच्चा पहाड़ की तरफ भागा और डर के मारे पहाड़ की चोटी मे छुप गया।

समूद पर अल्लाह का अज़ाब -

हज़रत सालेह (अ.स)  को जब इस अत्याचार की खबर मिली, तो उनकी बेचैनी बढ़ गयी। वह परेशान इसलिए हुए कि अब अल्लाह का अज़ाब इस कौम पर आ कर रहेगा। फरमाया कि अगर उसके बच्चे को किसी तरह पकड़ कर अपने दर्मियान लाओगे तो शायद अल्लाह के गज़ब से अपने आप को बचा लोगे। कौम के लोग भी डर गये थे, इसलिए वो लोग उस ऊंटनी के बच्चे को ढूंढने में बड़ी मेहनत की, पर वह बच्चा न मिला, इस तरह पूरी कौम अल्लाह तआला के अज़ाब में आ गयी।

हज़रत सालेह (अ.स)  ने गए कि तीन दिन के बाद  तुम सब खत्म हो जाओगे और अज़ाब आ जायेगा। अज़ाब की निशानी यह है कि पहले दिन तुम्हारे मुंह पीले, दूसरे दिन लाल, और तीसरे दिन काले होंगे। फिर चौथे दिन अल्लाह के अज़ाब के शिकार बन कर तबाह हो जाओगे। दुश्मनों ने जब यह बात सुनी तो उन्होंने हज़रत सालेह  (अ.स) को मारने का इरादा कर लिया और छिप कर घात में गए। हज़रत सालेह (अ.स)  को मारने का इरादा करने में पूरी कौम शामिल थी, लेकिन वे अपनी चाल चल रहे थे और अल्लाह जो सबसे बेहतर चाल चलने वाला है, अपनी चाल चल रहा था।

हज़रत सालेह (अ.स)  के घर वालों को जब मालूम हुआ कि कौम के लोग ऐसा कर रहे हैं, तो उन्होंने जा कर पूछा कि अगर हज़रत सालेह (अ.स) के वादे के मुताबिक तुम तीन दिन में फना हो जाओगे तो अल्लाह के दरबार में इस बे-अदबी से तुम्हें और तक्लीफ ही पहुंचेगी। और अगर हज़रत सालेह (अ.स) की बात गलत होगी, तो फिर तुम जो चाहो करना, हम सब उस वक्त समझ लेंगे। कौम वालों की समझ में यह बात आ गई, वे अपने-अपने घरों को वापस चले गये। दूसरे दिन फिर कौम के लोग जमा हुए, हर एक के चेहरे पर मौत की हवाइयाँ उड़ रही थीं। जमा हो कर सब बोले, आखिर हम तो मरेंगे ही, लेकिन हज़रत सालेह (अ.स) को भी मार कर अपने आगे दफ्न करेंगे।

हज़रत सालेह (अ.स) ने जब यह खबर सुनी तो तो अल्लाह से दुआ की तो अल्लाह के हुक्म से वो अकील बिन नौफल के घर चले गये। कौम वाले परेशान ढूँढते फिरे और हज़रत सालेह (अ.स)  उन्हें हाथ न लगे। दूसरे दिन सुबह सबके मुंह खून की तरह लाल हो गये। रंगत की यह तब्दीली देखकर उनकी बेचैनी बढ़ गई, रोने-पीटने लगे। फिर सनीचर के दिन उनके चेहरे काले हो गये, सभी अपनी जिंदगी का आखिर समझ कर बहुत परेशान थे।

हज़रत सालेह (अ.स)  उसी दिन अल्लाह के हुक्म से सभी  ईमान वालों को साथ लेकर फिलिस्तीन चले गये और वो बे-ईमान और कमबख्त अपनी बस्ती ही में पड़े रहे।

फिर जमीन हरकत करने लगी और वे लोग अपने घरों में औंधे पड़े रह गए और असमान से गजबनाक चीखें आने लगी जिससे उनके भेजे फट गए। एक ही लम्हे में सब के सब ढेर हो गए।

हज़रत सालेह (अ.स) की वफात –

हज़रत सालेह (अ.स) अल्लाह के हुक्म के मुताबिक़ सब कुछ शांत हो जाने के बाद फिर वापस उस जगह आये, कौम की यह हालत देख कर बहुत रोये और लोगों को उस क़ौम से सबक लेने की नसीहत की। फिर हज़रत सालेह (अ.स) कुछ समय बाद वहाँ से मक्का की तरफ चले गये और वही आप की वफात हुई।

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