इब्न बतूता – अब तक का सबसे महान यात्री

इब्न बतूता - अब तक का सबसे महान यात्री

परिचय:-

इब्नबतूता अरब यात्री, विद्वान और लेखक था। उत्तरी अफ्रीका के मोरक्को के प्रसिद्ध नगर तांजियर में 14 रजब, 703 हि. (24 फरवरी, 1304 ई.) को इसका जन्म हुआ था। इसक पूरा नाम मुहम्मद बिन अब्दुल्ला इब्नबतूता था। इब्नबतूता आरंभ से ही बड़ा धर्मानुरागी था। उसे मक्के की यात्रा (हज) तथा प्रसिद्ध मुसलमानों का दर्शन करने की बड़ी अभिलाषा थी। इस आकांक्षा को पूरा करने के उद्देश्य से वह केवल 21 बरस की आयु में यात्रा करने निकल पड़ा। चलते समय उसने यह कभी न सोचा था कि उसे इतनी लंबी देश देशांतरों की यात्रा करने का अवसर मिलेगा। मक्के आदि तीर्थस्थानों की यात्रा करना प्रत्येक मुसलमान का एक आवश्यक कर्त्तव्य है। इसी से सैकड़ों मुसलमान विभिन्न देशों से मक्का आते रहते थे। इन यात्रियों की लंबी यात्राओं को सुलभ बनाने में कई संस्थाएँ उस समय मुस्लिम जगत में उत्पन्न हो गई थीं जिनके द्वारा इन सबको हर प्रकार की सुविधाएँ प्राप्त होती थीं और उनका पर्यटन बड़ा रोचक तथा आनंददायक बन जाता था। इन्हीं संस्थाओं के कारण दरिद्र से दरिद्र हाजी भी दूर-दूर देशों से आकर हज करने में समर्थ होते थे। इब्नबतूता ने इन संस्थाओं की बार-बार प्रशंसा की है। वह उनके प्रति अत्यंत कृतज्ञ है। इनमें सर्वोतम वह संगठन था जिसके द्वारा बड़े से बड़े यात्री दलों की हर प्रकार की सुविधा के लिए हर स्थान पर आगे से ही पूरी-पूरी व्यवस्था कर दी जाती थी एवं मार्ग में उनकी सुरक्षा का भी प्रबंध किया जाता था। प्रत्येक गाँव तथा नगर में ख़ानकाहें (मठ) तथा सराएँ उनके ठहरने, खाने पीने आदि के लिए होती थीं। धार्मिक नेताओं की तो विशेष आवभगत होती थी। हर जगह शेख, काजी आदि उनका विशेष सत्कार करते थे। इस्लाम के भ्रातृत्व से सिद्धांत का यह संस्था एक ज्वलंत उदाहरण थी। इसी के कारण देश-देशांतरों के मुसलमान बेखटके तथा बड़े आराम से लंबी-लंबी यात्राएँ कर सकते थे। दूसरी सुविधा मध्यकाल के मुसलमानों का यह प्राप्त थी कि अफ्रीका और भारतीय समुद्रमार्गों का समूचा व्यापार अरब सौदागरों के हाथों में था। ये सौदागर भी मुसलमान यात्रियों का उतना ही आदर करते थे।

ibn-battuta

भ्रमण वृत्तांत:-

इब्नबतूता दमिश्क और फिलिस्तीन होता हुआ एक कारवाँ के साथ मक्का पहुँचा। यात्रा के दिनों में दो साधुओं से उसकी भेंट हुई थी जिन्होंने उससे पूर्वी देशों की यात्रा के सुख सौंदर्य का वर्णन किया था। इसी समय उसने उन देशों की यात्रा का संकल्प कर लिया। मक्के से इब्नबतूता ईराक, ईरान, मोसुल आदि स्थानों में घूमकर 1329 (729 हि.) में दुबारा मक्का लौटा और वहाँ तीन बरस ठहरकर अध्ययन तथा भगवदभक्ति में लगा रहा। बाद में उसने फिर यात्रा आरंभ की और दक्षिण अरब, पूर्वी अफ्रीका तथा फारस के बंदरगाह हुर्मुज से तीसरी बार फिर मक्का गया। वहाँ से वह क्रीमियां, खीवा, बुखारा होता हुआ अफगानिस्तान के मार्ग से भारत आया। भारत पहुँचने पर इब्नबतूता बड़ा वैभवशाली एवं संपन्न हो गया था।

भारत प्रवेश:-

इब्नबतूता 1333 ई. में सुल्तान मुहम्मद तुग़लक़ के राज्यकाल में भारत आया। भारत के उत्तर-पश्चिम द्वार में प्रवेश करते हुए, इब्न बतूता सीधे दिल्ली गया, जहाँ तुगलक सुल्तान मुहम्मद ने उसे बहुत सम्मान दिया और उसे राजधानी का काजी नियुक्त किया। पूरे सात साल तक इस पद पर रहे, जिसमें उन्हें सुल्तान को बहुत करीब से देखने का अवसर मिला, इब्न बतूता ने हर घटना को बहुत ध्यान से देखा और सुना। 1342 में मुहम्मद तुगलक ने उसे चीन के बादशाह के पास अपना राजदूत बनाकर भेजा, परंतु दिल्ली से प्रस्थान करने के थोड़े दिन बाद ही वह बड़ी विपत्ति में पड़ गया और बड़ी कठिनाई से अपनी जान बचाकर अनेक आपत्तियाँ सहता वह कालीकट पहुँचा। ऐसी परिस्थिति में सागर की राह चीन जाना व्यर्थ समझकर वह भूभाग से यात्रा करने निकल पड़ा और लंका, बंगाल आदि प्रदेशों में घूमता चीन जा पहुँचा। किंतु शायद वह मंगोल खान के दरबार तक नहीं गया। इसके बाद उसने पश्चिम एशिया, उत्तर अफ्रीका तथा स्पेन के मुस्लिम स्थानों क भ्रमण किया और अंत में टिंबकट आदि होता वह 1354 के आरंभ में मोरक्को की राजधानी ‘फेज’ लौट गया।

महान यात्री:-

इब्न बतूता मुस्लिम यात्रियों में सबसे महान था। ऐसा अनुमान है कि उन्होंने लगभग 75,000 मील की यात्रा की। उस जमाने के शायद ही किसी और यात्री ने इतनी लंबी यात्रा की हो। ‘फेज’ लौटकर उसने अपना भ्रमण वृत्तांत सुल्तान को सुनाया। उनका विवरण आम तौर पर विश्वसनीय है, फिर भी अतिशयोक्ति से भरा है। सुल्तान के आदेशानुसार उसके सचिव मुहम्मद इब्न जुज़ैय ने उसे लेखबद्ध किया। इब्न बतूता का बाकी जीवन अपने देश में ही बीता। इब्न बत्तूता के भ्रमणवृत्तांत को ‘तुहफ़तअल नज्ज़ार फ़ी गरायब अल अमसार व अजायब अल अफ़सार’ का नाम दिया गया। इसकी एक प्रति पेरिस के राष्ट्रीय पुस्तकालय में सुरक्षित हैं। उनके यात्रा वृतांत में तत्कालीन भारतीय इतिहास की बहुत उपयोगी सामग्री मिलती है। इब्न बतूता ने सुल्तान द्वारा जिन कारणों से राजधानी को दिल्ली से हटाकर दौलताबाद ले जाने का आदेश दिया गया और जिस रीति से दिल्ली को पूरी तरह से ख़ाली कराया गया, उसका जो वर्णन लिखा है, उसे उदाहरण स्वरूप प्रस्तुत किया जा सकता है।

मृत्यु:-

इब्नबतूता की मृत्यु 1377 (779 हि.) में हुई।

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