वित्र

witr, musafir or beemar ki namaz

वित्र की नमाज़

वाजिब हैं। इनकी तीनों रक्अतों में सूरः फ़ातिहा के बाद कोई सूर: पढ़ी जाती है।

तीसरी रक्त में सूर: पढ़ने के बाद तक्बीर कह कर दोनों हाथ कानों तक उठाइए और बांध कर दुआ-ए-कुनूत पढ़िए।

दुआ-ए-कुनूत के बाद क़ायदे के मुताबिक़ रुकूअ व सज्दे करके नमाज़ पूरी कीजिए।

सिर्फ रमज़ान के महीने में जमाअत के साथ वित्र पढ़े जाते हैं।

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मुसाफ़िर की नमाज़

मुसाफ़िर की नमाज़ जब वह अपने शहर से निकलता है उस समय से लेकर फ़िर वहीं वापस लौटने तक दो रक्अतें है।

वह जुहू, अस और इशा कि फर्ज़ नमाज़ दो रक्अतें पढ़े और सुन्नतों का यह हुक्म है कि अगर जल्दी में हो तो फ़र्ज़ की सुन्नतों के । सिवा और नमाज़ों की सुन्नतें छोड़ सकता है, इनके छोड़ देने से गुनाह न होगा और अगर जल्दी न हो, न अपने साथियों से रह जाने का डर हो, तो न छोड़िये और सफ़र में सुन्नतें पूरी पढ़िए। उनमें कमी नहीं है। फ़र्ज़ और मगरिब और वित्र की नमाज़ में भी कोई कमी नहीं है।

“जब तुम इकामत सुनो तो नमाज के लिये चल पड़ो, इस तरह की तुम पर शान्ती व गम्भीरता दिखे। और दोड़ते हुए न चलो, जो कुछ मिले उसे पढ़ लो और जो कुछ छूट जाये उसे पूरा कर लो।” (बुखारी हदीस न० ६३६, मुस्लिम हदीस न० १५१)

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बीमार की नमाज़

नमाज़ किसी हालत में न छोड़िये। जब तक खड़े होकर नमाज़ पढ़ने की ताक़त हो, खड़े होकर नमाज़ पढ़िए और जब खड़े न हो सकते हों, तो बैठ कर नमाज़ पढ़िए, बैठे-बैठे रुकूअ कर लीजिए और रुकूअ करके दोनों सज्दे कर लीजिए।

रुकूअ के लिए इतना झुकिए की कमर और सर बराबर हो जाएं। अगर रुकूअ-सज्दा करने की भी कुदरत न हो, तो रुकूअ और सज्दा को सर के इशारे से अदा कर सकते हैं। सज्दे के लिए रुकूअ से ज्यादा सर झुकाना चहिए।

सज्दा करने के लिए तकिया वगैरह कोई ऊंची चीज़ रख लेना ना-जायज़ है।

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नमाज़ का तरीक़ा
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