आलमे बरज़ख का दरवाज़ा खुला

Aalam-e-Barzakh ka darwaza

मलिक उल मौत

आख़िरत की मराजिअत के वक्त सब से पहले आप को ‘मलिक उल मौत’ से मिलना है और ‘मलिक उल मौत’ के माने है “मौत का फ़रिशता” उन का नाम ‘हज़रत इजराईल’ है। मौत भी अल्लाह की एक मखलूक है।

अल्लाह तआला ने जब मौत को पैदा किया तो उस के सामने दस लाख पर्दे ढाल दिए और हर पर्दे का तूल व अर्ज़ ज़मीन व आसमान से कहीं बड़ा है। मौत की जिसामत का हाल इससे मालूम होता है कि अगर तमाम दुनिया के नदियों और नहरों का पानी उस के सर पर डाला जाए तो एक कतरा ज़मीन पर न गिरे और सारी कायनात उस के सामने इस तरह रखी हुई है जैसे किसी शख्स के कदमों में कोई छोटी सी थाली रखी हो ।

अल्लाह तआला ने हज़रत इजराईल को जब मौत पर मुसल्लत फ़रमाया तो उन्होंने अर्ज़ किया, खुदावन्दा ! मौत क्या चीज़ है। परवरदिगारे आलम ने मौत के सामने से सारे पर्दे हटा दिये और फरिश्तों को हुक्म हुआ कि आओ तुम सब मौत को देख लो। फरिश्तों ने जब मौत का नज़ारा किया तो बेहोश हो कर गिर पड़े जब उन को होश आया तो पूछा इलाही मौत से भी बड़ी कोई चीज़ दुनिया में मौजूद है! हक ताला ने फरमाया मौत को मैं ने पैदा किया है मौत से बड़ा मै हुँ और मुझ से बड़ा कोई नहीं, और दुनिया में मैं ने जितनी मखलूक पैदा की है उसका एक बार मौत से ज़रूर वास्ता पड़ेगा। हके तबारक व तआला की अता की हुई खुसूसी ताकत से हज़रत इजराईल ने मौत को अपने हाथ पर बिठा लिया और इसी के ज़रिए वह जानदारों की रूह कब्ज़ करते हैं।

मलिक उल मौत की शक्ल व सूरत

रिवायत है कि हज़रत इब्राहीम अले० को जब खुदावन्दे आलम ने नबुव्वत की खिलअत से नवाजा तो ख़ुदा के हुक्म से मलिक उल मौत भी हज़रत इब्राहीम अलै० को मुबारकबाद देने आए। आप ने अल्लाह तआला की हम्द व सना के बाद ‘मलिक उल मौत’ से पूछा कि मुझे यह बता दो के तुम काफ़िरों की रूह किस सूरत से कब्ज़ करते हो। ‘मलिक उल मौत’ ने कहा कि वह खौफनाक व हैबत असर नज़ारा आप न देख सकेंगे। आप ने फरमाया क्यों नहीं। मुझे तुम दिखाओ तो। ‘मलिक उल मौत’ ने कहा कि अच्छा आप ज़रा मुँह फेर लीजिए। हज़रत इब्राहीम अलै० ने जब मुँह फेर कर उस की तरफ देखा तो एक सयाह बालों वाला हैबतनाक इतना लम्बा आदमी नज़र आया जिस का सर आसमान से लगा हुआ मालूम होता था। उसके मुँह से आग के शोले और धुआँ निकल रहा था और उसके जिस्म के मसामात से चिंगारयाँ फूट रहीं थी।

हज़रत इब्राहीम अलै० यह खौफनाक मंज़र देखते ही बेहोश हो गए। थोड़ी देर बाद जब आप को होश आया तो आप ने देखा के ‘मलिक उल मौत’ अपनी पहली शक्ल व सूरत में बैठे थे। आप ने फ़रमाया अगर काफ़िर को, अज़िय्यत व सख्ती पेश न भी आए तो तुम्हारी यह भयानक व हैबतनाक सूरत ही उसके लिए बड़ा अजाब है और यही उसको काफी है।

इसके बाद हज़रत इब्राहीम अलै० ने फ़रमाया
कि अब माकमिन की रूह कब्ज़ करने का भी नज़ारा दिखा दो। ‘मलिक उल मौत’ के कहने पर आपने मुँह फ़ेर कर देखा तो सामने निहायत हसीन व खुबसूरत और खुश वज़ा व बहतरीन मलबूस में खुशबूदार जवान बैठा है, आप ने फरमाया अगर मोमिन को करामत व बुजुगऍ हासिल न भी हो तो तुम्हारी हसीन व जमील दिलपज़ीर जांफ़िज़ा सूरत ही काफी है के यह देखते ही रूह उस पर फिदा हो जाए।
हज़रत इब्राहीम अलै० ने दरयाफ्त फरमाया के अगर एक आदमी मशरिक़ में हो और दूसरा मग़रिब में हो तो यह आलम बहुत वसी व कुशादा है कहीं वबा में फैल रही हो और कहीं जंग हो रही हो ऐसी सूरत तुम रूह को क़ब्ज़ करने के फ़ाइज़ कैसे अंजाम देते हो। मलिक उल मौत ने जवाब दिया के जब उसे मवाके पेश होते हैं तो में अल्लाह के हुक्म से अरवाह को बुलाता हूँ और वह आकर मेरी दो उंगलियों के दरमियान जमा हो जाती है और मेरे रूबरू ज़मीन इस तरह सिमट कर आ जाती है जिस तरह किसी आदमी के सामने तश्तरी रख दी जाए और वह जो चीज़ चाहे उठा ले और जिसे चाहे छोड़ दे। मुझे रूह कब्ज़ करने में कोई दुशवारी और मुशकिल नहीं। रिवायत है के बाज अंबिया ने मौत से कहा के लोगों को तू अपनी आमद की इत्तला पहले से क्यों नहीं देती। उस ने जवाब दिया के मेरी आमद से बहुत पहले मेरे क़ासिद मेरा पैग़ाम पहुँचा देते हैं। हादसात व इन्किलाबात, बुढ़ापा, बालों की सफेदी, बीमारीए बसारत की कमज़ोरी वगैरह मेरे ही तो कासिद हैं, मगर लोगों को फिर भी होश नहीं आता और वह गफलत के पर्दे में रहते हैं।

मलिक उल मौत के मददगार

रबी बिन अनस रज़ी० से किसी शख्स ने पूछा के क्या मलिक उल मौत तन्हा रूह कब्ज़ कर लेता है। उन्होंने जवाब दिया के मलिक उल मौत के बहुत से फरिश्ते मुआविन व मददगार हैं, जिन को अल्लाह तआला ने मुकर्रर कर रखा है और वही इस काम को अंजाम देते हैं और मलिक उल मौत इन सब फरिश्तों के अफसर हैं जिन की तेज रफ़्तारी का यह आलम है कि एक कदम मशरिक में पड़ता है और दूसरा क़दम मग़रिब में, मलिक उल मौत के साथ रहमत और अज़ाब के फरिश्ते रहते हैं। नेकों की रूह कब्ज़ करके रहमत कें फ़रिश्तों के हवाले कर दी जाती है। हज़रत अनस रजि० से रिवायत है के सरवरे काएनात हुजूर सल्ल० ने फ़रमाया कि मौत के वक्त मय्यत को चारों तरफ से फरिश्ते घेरे और जकड़े रहते है। अगर वह ऐसा नहीं करते तो मरने वाले मौत की सख्ती और शिदृते तकलीफ से जंगलों में भागा भागा फिरता और नेक बन्दे की मय्यत पर फ़रिशते दुआ व इसतिगफार उस वक्त तक करते रहते हैं तब तक उसके मुताल्लिकीन तकफ़ीन व तअफीन से फारिग नहीं हो जाते। इस तरह ‘मलिक उल मौत’ के साथ बहुत से फरिश्ते रहते हैं।

'मलिक उल मौत' खुदा के हुक्म के ताबे हैं

हज़रत सुलेमान अलै० ने मलिक उल मौत से पूछा के तुम लोगों के साथ इन्साफ़ क्यों नहीं करते। किसी की रूह तो फौरी तौर पर कब्ज़ कर लेते हो और उसे जल्द से जल्द इस दुनिया से मुंतकिल कर देते हो और किसी को तकलीफों और अज़िय्यतों में इस तरह उलझाते हो कि वह लाचार व मजबूर पड़ा तड़पता है। ‘मलिक उल मौत’ ने कहा के यह बात मेरे कब्ज़े व इखतियार में नहीं है। हर एक के नाम का एक सहीफा मुझे मिलता है जैसा हुक्म होता है बजा लाता हूँ।

रिवायत है के शाबान के महीने में ‘मलिक उल मौत’ को एक कागज़ दिया जाता है उस में उन तमाम लोगों के नाम लिखे रहते हैं जिन की रूह कब्ज़ करने इस साल उन के जिम्मे होता है, मगर दुनिया के लोग अपनी रिहाइश व आसाइश के कामों में मसरूफ रहते हैं। दौलत की फराहमी, मकान की तामीर, खेती बाड़ी, शादी ब्याह गर्ज़ के तरह तरह की तैयारियाँ करते हैं और वह बिलकुल नहीं जानते कि इस साल उनसे दुनिया छूट जाएगी।हालांकि उन का नाम ‘मलिक उल मौत’ के कागज़ में तहरीर होता है और ‘मलिक उल मौत रोज़ाना’ हर मकान में तीन मरतबा इसलिए जाते हैं के जिस शख़्स की मुदृत पूरी हो गई है उस की रूह कब्ज़ कर ली जाए पस जब यह किसी की जान लेते हैं तो मरने वाले के मुताल्लीकीन रोना चिलाना शुरू कर देते हैं, उस वक्त ‘मलिक उल मौत’ दावाज़े का बाजू पकड़ कर कहते हैं के मैं ने कोई ज़ियादती नहीं की न मैं ने इस की रोज़ी छीनी है और न मैं ने वक़्त से पहले इस की रूह कब्ज़ की है इसका पूरा वक्त हो चुका है मैं ने अल्लाह के हुक्म की तामील की और अपना फ़र्ज़ अदा किया।

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