Surah Al-Adiyat in Hindi

हिन्दी में सूरह अल-आदियात

सूरह अल-आदियात मक्के में नाजिल हुई। इसमें 11 आयतें हैं। अल्लाह ने इंसान को एक घोड़े से तुलना दे कर इंसानी जात को ये बताया है कि जिस तरह घोड़ा अपने मालिक का आज्ञापालक बन कर रहता है। इसी तरह इंसान को अल्लाह का फरमाबरदार बंदा बन कर जिंदगी को गुजरना है। और उस अल्लाह का शुक्रिया अदा करना है। जिसने हमें दुनिया की सारी अच्छी चीजें दी है।

सूरह अल-आदियात हिन्दी में

बिस्मिल्ला हिर रहमानिर रहीम

  1. वल आदियाति ज़ब्हा
  2. फ़ल मूरियाति क़दहा
  3. फ़ल मुगीराति सुबहा
  4. फ़ असरना बिही नक़आ
  5. फ़वा सतना बिही जमआ
  6. इन्नल इंसान लिरब्बिही लका नूद
  7. व इन्नहू अला ज़ालिका लशा हीद
  8. व इन्नहू लिहुब्बिल खैरि लशा दीद
  9. अफाला यअलमु इज़ा बुआ सिरा माफ़िल क़ुबूर
  10. व हुस्सिला माफिस सुदूर
  11. इन्ना रब्बहुम बिहिम यौ मइज़िल ल खाबीर

हिंदी अनुवाद के साथ सूरह अल-आदियात

अल्लाह के नाम से, जो अत्यन्त कृपाशील तथा दयावान् है।

  1. उन घोड़ों कि कसम जो हांफते हुए दौड़ते है।
  2. फ़िर पत्थर पर टाप मार कर चिंगारियां निकालते है।
  3. फ़िर सुबह के वक़्त दुश्मन की फौज पर हमला करते है
  4. फ़िर धूल उड़ाते है।
  5. फ़िर इसी वक़्त दुश्मन के फौज में जा घुसते है।
  6. बेशक इंसान अपने रब का बड़ा नाशुक्रा है।
  7. और बेशक इंसान इस हक़ीक़त पर खुद गवाह है।
  8. और बेशक वो माल कि मुहब्बत में बड़ा सख़्त है।
  9. क्या वो नहीं जानता कि एक दिन क़ब्रो के मुर्दे बाहर निकाल लिए जाएंगे।
  10. और जो दिलों ने है वो सब ज़ाहिर किया जाएगा।
  11. बेशक इन का रब इन से इस दिन अच्छी तरह खबर रखने वाला है।

Surah Al-Adiyat in English

Bismillaahir Rahmaanir Raheem

  1. Wal’aadi yaati dabha
  2. Fal moori yaati qadha
  3. Fal mugheeraati subha
  4. Fa atharna bihee naq’a
  5. Fawa satna bihee jam’a
  6. Innal-insana lirabbihee lakanood
  7. Wa innahu ‘alaa zaalika la shaheed
  8. Wa innahu lihubbil khairi la shadeed
  9. Afala ya’lamu iza b’uthira ma filquboor
  10. Wa hussila maa fis sudoor
  11. Inna rabbahum bihim yauma ‘izin lakhabeer

Surah Al-Adiyat English Translation

In the name of Allah, Most Gracious, Most Merciful.

  1. By the (Steeds) that run, with panting (breath),
  2. And strike sparks of fire,
  3. And push home the charge in the morning,
  4. And raise the dust in clouds the while,
  5. And penetrate forthwith into the midst (of the foe) en masse;-
  6. Truly man is, to his Lord, ungrateful;
  7. And to that (fact) he bears witness (by his deeds);
  8. And violent is he in his love of wealth.
  9. Does he not know,- when that which is in the graves is scattered abroad
  10. And that which is (locked up) in (human) breasts is made manifest-
  11. That their Lord had been Well-acquainted with them, (even to) that Day?
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