Surah Yaseen in Hindi

हिन्दी में सूरह यासीन शरीफ़

सूरह यासीन मक्का में उतरी, इसमें 83 आयतें और पांच रूकू हैं। सात सौ उनतीस कलिमे और तीन हज़ार अक्षर हैं।

हदीस शरीफ में आया हैं की रसूल सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम ने फरमाया – मरने वाले के पास यासीन शरीफ पढ़ो। इसकी बरकत से मरने वाले की रूह आसानी से कब्ज़ की जाती है।  इंतकाल के बाद इसे पढ़कर इसाले सवाब करोगे तो उसके गुनाह बख्श दिए जाएंगे, कब्र पर पढ़ोगे तो बख्श दिया जाएगा।

एक रिवायत में है की हुज़ूर सल्लल लहू अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया मेरा दिल चाहता है कि सूरह यासीन मेरे हर उम्मती के दिल में हो यानी हर उम्मती को ज़ुबानी याद हो।

पढ़कर किसी पर दम करने से शैतानी साया दूर हो जाता है जो इंसान जुम्मे के दिन सूरह यासीन पढ़ेगा, अल्लाह पाक उसकी मुराद पूरी फरमाएंगे।

जो आदमी हर रोज़ अपने मां-बाप को सवाब पहचाने की नियत से सूरह यासीन पढ़ता है तो उनकी गिनती वालेदैन के फर्माबरदार में होती है। जो आदमी रोजी की बरकत तरक्की के लिए पढ़ता है तो उसकी रोजी में बरकत हो जाती है। जो मुसीबत के वक्त पढ़ेगा तो उसकी परेशानियां दूर हो जाएगी।

सूरह यासीन शरीफ़ हिन्दी में पढ़ें ​

बिस्मिल्लाहिर रहमानिर रहिम

  • 1. यासीन
  • 2. वल कुर आनिल हकीम
    3. इन्नका लमिनल मुरसलीन
  • 4. अला सिरातिम मुस्तकीम
    5. तनजीलल अजीज़िर रहीम
  • 6. लितुन ज़िरा कौमम मा उनज़िरा आबाउहुम फहुम गाफिलून
    7. लकद हक कल कौलु अला अकसरिहिम फहुम ला युअ’मिनून
  • 8. इन्ना जअल्ना फी अअ’ना किहिम अगलालन फहिया इलल अजक़ानि फहुम मुक़महून
    9. व जअल्ना मिम बैनि ऐदी हिम सद्दव वमिन खलफिहिम सद्दन फअग शैनाहुम फहुम ला युबसिरून
  • 10. वसवाउन अलैहिम अअनजर तहुम अम लम तुनजिरहुम ला युअ’मिनून
    11. इन्नमा तुन्ज़िरू मनित तब अज़ ज़िकरा व खशियर रहमान बिल्गैब फबश्शिर हु बिमग फिरतिव व अजरिन करीम
  • 12. इन्ना नहनु नुहयिल मौता वनकतुबु मा क़द्दमु व आसारहुम वकुल्ला शयइन अहसैनाहु फी इमामिम मुबीन
    13. वज़ रिब लहुम मसलन असहाबल करयह इज़ जा अहल मुरसळून
  • 14. इज़ अरसलना इलयहिमुस नैनि फकज जबूहुमा फ अज़ ज़ज्ना बिसा लिसिन फकालू इन्ना इलैकुम मुरसळून
    15. कालू मा अन्तुम इल्ला बशरुम मिसळूना वमा अनजलर रहमानु मिन शय इन इन अन्तुम इल्ला तकज़िबुन
  • 16. क़ालू रब्बुना यअ’लमु इन्ना इलैकुम लमुरसळून
    17. वमा अलैना इल्लल बलागुल मुबीन
  • 18. कालू इन्ना ततैयरना बिकुम लइल लम तनतहू लनरजु मन्नकूम वला यमस सन्नकुम मिन्ना अज़ाबुन अलीम
    19. कालू ताइरुकुम म अकुम अइन ज़ुक्किरतुम बल अन्तुम क़ौमूम मुस रिफून
  • 20. व जा अमिन अक्सल मदीनति रजुलुय यसआ काला या कौमित त्तबिउल मुरसलीन
    21. इत तबिऊ मल ला यस अलुकुम अजरौ वहुम मुहतदून
  • 22. वमालिया ला अअ’बुदुल लज़ी फतरनी व इलैहि तुरजऊन
    23. अ अत्तखिज़ु मिन दुनिही आलिहतन इय युरिदनिर रहमानु बिजुर रिल ला तुगनि अन्नी शफ़ा अतुहुम शय अव वला यूनकिजून
  • 24. इन्नी इज़ल लफी ज़लालिम मुबीन
    25. इन्नी आमन्तु बिरब बिकुम फसमऊन
  • 26. कीलद खुलिल जन्नह काल यालैत क़ौमिय यअ’लमून
    27. बिमा गफरली रब्बी व जअलनी मिनल मुकरमीन
  • 28. वमा अन्ज़लना अला क़ौमिही मिन बअ’दिही मिन जुन्दिम मिनस समाइ वमा कुन्ना मुनजिलीन
    29. इन कानत इल्ला सैहतौ वाहिदतन फइज़ा हुम् खामिदून
  • 30. या हसरतन अलल इबाद मा यअ’तीहिम मिर रसूलिन इल्ला कानू बिही यस तहज़िऊन
    31. अलम यरौ कम अहलकना क़ब्लहुम मिनल कुरूनि अन्नहुम इलैहिम ला यर जिऊन
  • 32. वइन कुल्लुल लम्मा जमीउल लदैना मुह्ज़रून
    33. व आयतुल लहुमूल अरज़ुल मैतह अह ययनाहा व अखरजना मिन्हा हब्बन फमिनहु यअ कुलून
  • 34. व जअलना फीहा जन्नातिम मिन नखीलिव व अअ’नाबिव व फज्जरना फीहा मिनल उयून
    35. लियअ’ कुलु मिन समरिही वमा अमिलत हु अयदीहिम अफला यशकुरून
  • 36. सुब्हानल लज़ी ख़लक़ल अज़वाज कुल्लहा मिम मा तुमबितुल अरज़ू वमिन अनफुसिहिम वमिम मा ला यअलमून
    37. व आयतुल लहुमूल लैल नसलखु मिन्हुन नहारा फइज़ा हुम् मुजलिमून
  • 38. वश शमसु तजरि लिमुस्त कररिल लहा ज़ालिका तक़्दी रूल अज़ीज़िल अलीम
    39. वल कमर कद्दरनाहु मनाज़िला हत्ता आद कल उरजुनिल क़दीम
  • 40. लश शम्सु यमबगी लहा अन तुद रिकल कमरा वलल लैलु साबिकुन नहार वकुल्लुन फी फलकिय यसबहून
    41. व आयतुल लहुम अन्ना हमलना ज़ुररिय यतहूम फिल फुल्किल मशहून
  • 42. व खलकना लहुम मिम मिस्लिही मा यरकबून
    43. व इन नशअ नुगरिक हुम फला सरीखा लहुम वाला हुम युन्क़जून
  • 44. इल्ला रहमतम मिन्ना व मताअन इलाहीन
    45. व इजा कीला लहुमुत तकू मा बैना ऐदीकुम वमा खल्फकुम लअल्लकुम तुरहमून
  • 46. वमा तअ’तीहिम मिन आयतिम मिन आयाति रब्बिहिम इल्ला कानू अन्हा मुअ रिजीन
    47. व इज़ा कीला लहुम अन्फिकू मिम्मा रजका कुमुल लाहु क़ालल लज़ीना कफरू लिल लज़ीना आमनू अनुत इमू मल लौ यशाऊल लाहू अत अमह इन अन्तुम इल्ला फ़ी ज़लालिम मुबीन
  • 48. व यकूलूना मता हाज़ल व’अदू इन कुनतुम सादिक़ीन
    49. मा यन ज़ुरूना इल्ला सैहतव व़ाहिदतन तअ खुज़ुहुम वहुम यखिस सिमून
  • 50. फला यस्ता तीऊना तौ सियतव वला इला अहलिहिम यरजिऊन
    51. व नुफ़िखा फिस सूरि फ़इज़ा हुम मिनल अज्दासि इला रब्बिहिम यन्सिलून
  • 52. कालू या वय्लना मम ब असना मिम मरक़दिना हाज़ा मा व अदर रहमानु व सदकल मुरसलून
    53. इन कानत इल्ला सयहतव वहिदतन फ़ इज़ा हुम जमीउल लदैना मुहज़रून
  • 54. फल यौम ला तुज्लमु नफ्सून शय अव वला तुज्ज़व्ना इल्ला मा कुंतुम तअ मलून
    55. इन्न अस हाबल जन्न्तिल यौमा फ़ी शुगुलिन फाकिहून
  • 56. हुम व अज्वा जुहूम फ़ी ज़िलालिन अलल अराइकि मुत्तकिऊन
    57. लहुम फ़ीहा फाकिहतुव वलहुम मा यद् दऊन
  • 58. सलामुन कौलम मिर रब्बिर रहीम
    59. वम ताज़ुल यौमा अय्युहल मुजरिमून
  • 60. अलम अअ’हद इलैकुम या बनी आदम अल्ला तअ’बुदुश शैतान इन्नहू लकुम अदुववुम मुबीन
    61. व अनिअ बुदूनी हाज़ा सिरातुम मुस्तक़ीम
  • 62. व लक़द अज़ल्ला मिन्कुम जिबिल्लन कसीरा अफलम तकूनू तअकिलून
    63. हाज़िही जहन्नमुल लती कुन्तुम तूअदून
  • 64. इस्लौहल यौमा बिमा कुन्तुम तक्फुरून
    65. अल यौमा नाख्तिमु अला अफ्वा हिहिम व तुकल लिमुना अयदीहिम व तशहदू अरजु लुहुम बिमा कानू यक्सिबून
  • 66. व लौ नशाउ लता मसना अला अअ’युनिहिम फ़स तबकुस सिराता फ अन्ना युबसिरून
    67. व लौ नशाउ ल मसखना हुम अला मका नतिहिम फमस तताऊ मुजिय यौ वला यर जिऊन
  • 68. वमन नुअम मिरहु नुनक किसहु फिल खल्क अफला यअ’ किलून
    69. वमा अल्लम नाहुश शिअ’रा वमा यम्बगी लह इन हुवा इल्ला जिक रुव वकुर आनुम मुबीन
  • 70. लियुन जिरा मन काना हय्यव व यहिक क़ल कौलु अलल काफ़िरीन
    71. अव लम यरव अन्ना खलक्ना लहुम मिम्मा अमिलत अय्दीना अन आमन फहुम लहा मालिकून
  • 72. व ज़ल लल नाहा लहुम फ मिन्हा रकू बुहुम व मिन्हा यअ’कुलून
    73. व लहुम फ़ीहा मनाफ़िउ व मशारिबु अफला यश्कुरून
  • 74. वत तखजू मिन दूनिल लाहि आलिहतल लअल्लहुम युन्सरून
    75. ला यस्ता तीऊना नस रहुम वहुम लहुम जुन्दुम मुह्ज़रून
  • 76. फला यह्ज़ुन्का क़व्लुहुम इन्ना नअ’लमु मा युसिर रूना वमा युअ’लिनून
    77. अव लम यरल इंसानु अन्ना खलक्नाहू मिन नुत्फ़तिन फ़ इज़ा हुवा खसीमुम मुबीन
  • 78. व ज़रबा लना मसलव व नसिया खल्कह काला मय युहयिल इजामा व हिय रमीम
    79. कुल युहयीहल लज़ी अनश अहा अव्वला मर्रह वहुवा बिकुलली खल किन अलीम
  • 80. अल्लज़ी जअला लकुम मिनश शजरिल अख्ज़रि नारन फ़ इज़ा अन्तुम मिन्हु तूकिदून
    81. अवा लैसल लज़ी खलक़स समावाती वल अरज़ा बिक़ादिरिन अला अंय यख्लुक़ा मिस्लहुम बला वहुवल खल्लाकुल अलीम
  • 82. इन्नमा अमरुहू इज़ा अरादा शय अन अंय यकूला लहू कुन फयकून
    83. फसुब हानल लज़ी बियदिही मलकूतु कुल्ली शय इव व इलैहि तुरज ऊन

सूरह यासीन शरीफ़ तर्जुमा के साथ

खु़दा के नाम से (शुरू करता) हूँ जो बड़ा मेहरबान निहायत रहम वाला है

  • यासीन (1)
  • इस पुरअज़ हिकमत कु़रान की क़सम (2)
  • (ऐ रसूल) तुम बिलाशक यक़ीनी पैग़म्बरों में से हो (3)
  • (और दीन के बिल्कुल) सीधे रास्ते पर (साबित क़दम) हो (4)
  • जो बड़े मेहरबान (और) ग़ालिब (खु़दा) का नाजि़ल किया हुआ (है) (5)
  • ताकि तुम उन लोगों को (अज़ाबे खु़दा से) डराओ जिनके बाप दादा (तुमसे पहले किसी पैग़म्बर से) डराए नहीं गए (6)
  • तो वह दीन से बिल्कुल बेख़बर हैं उन में अक्सर तो (अज़ाब की) बातें यक़ीनन बिल्कुल ठीक पूरी उतरे ये लोग तो ईमान लाएँगे नहीं (7)
  • हमने उनकी गर्दनों में (भारी-भारी लोहे के) तौक़ डाल दिए हैं और ठुड्डियों तक पहुँचे हुए हैं कि वह गर्दनें उठाए हुए हैं (सर झुका नहीं सकते) (8)
  • हमने एक दीवार उनके आगे बना दी है और एक दीवार उनके पीछे फिर ऊपर से उनको ढाँक दिया है तो वह कुछ देख नहीं सकते (9)
  • और (ऐ रसूल) उनके लिए बराबर है ख़्वाह तुम उन्हें डराओ या न डराओ ये (कभी) ईमान लाने वाले नहीं हैं (10)
  • तुम तो बस उसी शख़्स को डरा सकते हो जो नसीहत माने और बेदेखे भाले खु़दा का ख़ौफ़ रखे तो तुम उसको (गुनाहों की) माफी और एक बाइज़्ज़त (व आबरू) अज्र की खु़शख़बरी दे दो (11)
  • हम ही यक़ीन्न मुर्दों को जि़न्दा करते हैं और जो कुछ लोग पहले कर चुके हैं (उनको) और उनकी (अच्छी या बुरी बाक़ी माँदा) निशानियों को लिखते जाते हैं और हमने हर चीज़ का एक सरीह व रौशन पेशवा में घेर दिया है (12)
  • और (ऐ रसूल) तुम (इनसे) मिसाल के तौर पर एक गाँव (अता किया) वालों का कि़स्सा बयान करो जब वहाँ (हमारे) पैग़म्बर आए (13)
  • इस तरह कि जब हमने उनके पास दो (पैग़म्बर योहना और यूनुस) भेजे तो उन लोगों ने दोनों को झुठलाया जब हमने एक तीसरे (पैग़म्बर शमऊन) से (उन दोनों को) मद्द दी तो इन तीनों ने कहा कि हम तुम्हारे पास खु़दा के भेजे हुए (आए) हैं (14)
  • वह लोग कहने लगे कि तुम लोग भी तो बस हमारे ही जैसे आदमी हो और खु़दा ने कुछ नाजि़ल (वाजि़ल) नहीं किया है तुम सब के सब बस बिल्कुल झूठे हो (15)
  • तब उन पैग़म्बरों ने कहा हमारा परवरदिगार जानता है कि हम यक़ीन्न उसी के भेजे हुए (आए) हैं और (तुम मानो या न मानो) (16)
  • हम पर तो बस खुल्लम खुल्ला एहकामे खु़दा का पहुँचा देना फज्र है (17)
  • वह बोले हमने तुम लोगों को बहुत नहस क़दम पाया कि (तुम्हारे आते ही क़हत में मुबतेला हुए) तो अगर तुम (अपनी बातों से) बाज़ न आओगे तो हम लोग तुम्हें ज़रूर संगसार कर देगें और तुमको यक़ीनी हमारा दर्दनाक अज़ाब पहुँचेगा (18)
  • पैग़म्बरों ने कहा कि तुम्हारी बद शुगूनी (तुम्हारी करनी से) तुम्हारे साथ है क्या जब नसीहत की जाती है (तो तुम उसे बदफ़ाली कहते हो नहीं) बल्कि तुम खु़द (अपनी) हद से बढ़ गए हो (19)
  • और (इतने में) शहर के उस सिरे से एक शख़्स (हबीब नज्जार) दौड़ता हुआ आया और कहने लगा कि ऐ मेरी क़ौम (इन) पैग़म्बरों का कहना मानो (20)
  • ऐसे लोगों का (ज़रूर) कहना मानो जो तुमसे (तबलीख़े रिसालत की) कुछ मज़दूरी नहीं माँगते और वह लोग हिदायत याफ्ता भी हैं (21)
  • और मुझे क्या (ख़ब्त) हुआ है कि जिसने मुझे पैदा किया है उसकी इबादत न करूँ हालाँकि तुम सब के बस (आखि़र) उसी की तरफ लौटकर जाओगे (22)
  • क्या मैं उसे छोड़कर दूसरों को माबूद बना लूँ अगर खु़दा मुझे कोई तकलीफ पहुँचाना चाहे तो न उनकी सिफारिश ही मेरे कुछ काम आएगी और न ये लोग मुझे (इस मुसीबत से) छुड़ा ही सकेंगें (23)
  • (अगर ऐसा करूँ) तो उस वक़्त मैं यक़ीनी सरीही गुमराही में हूँ (24)
  • मैं तो तुम्हारे परवरदिगार पर ईमान ला चुका हूँ मेरी बात सुनो और मानो ;मगर उन लोगों ने उसे संगसार कर डाला (25)
  • तब उसे खु़दा का हुक्म हुआ कि बेहिश्त में जा (उस वक़्त भी उसको क़ौम का ख़्याल आया तो कहा) (26)
  • मेरे परवरदिगार ने जो मुझे बख़्श दिया और मुझे बुज़ुर्ग लोगों में शामिल कर दिया काश इसको मेरी क़ौम के लोग जान लेते और ईमान लाते (27)
  • और हमने उसके मरने के बाद उसकी क़ौम पर उनकी तबाही के लिए न तो आसमान से कोई लशकर उतारा और न हम कभी इतनी सी बात के वास्ते लशकर उतारने वाले थे (28)
  • वह तो सिर्फ एक चिंघाड थी (जो कर दी गयी बस) फिर तो वह फौरन चिराग़े सहरी की तरह बुझ के रह गए (29)
  • हाए अफसोस बन्दों के हाल पर कि कभी उनके पास कोई रसूल नहीं आया मगर उन लोगों ने उसके साथ मसख़रापन ज़रूर किया (30)
  • क्या उन लोगों ने इतना भी ग़ौर नहीं किया कि हमने उनसे पहले कितनी उम्मतों को हलाक कर डाला और वह लोग उनके पास हरगिज़ पलट कर नहीं आ सकते (31)
  • (हाँ) अलबत्ता सब के सब इकट्ठा हो कर हमारी बारगाह में हाजि़र किए जाएँगे (32)
  • और उनके (समझने) के लिए मेरी कु़दरत की एक निशानी मुर्दा (परती) ज़मीन है कि हमने उसको (पानी से) जि़न्दा कर दिया और हम ही ने उससे दाना निकाला तो उसे ये लोग खाया करते हैं (33)
  • और हम ही ने ज़मीन में छुहारों और अँगूरों के बाग़ लगाए और हमही ने उसमें पानी के चशमें जारी किए (34)
  • ताकि लोग उनके फल खाएँ और कुछ उनके हाथों ने उसे नहीं बनाया (बल्कि खु़दा ने) तो क्या ये लोग (इस पर भी) शुक्र नहीं करते (35)
  • वह (हर ऐब से) पाक साफ है जिसने ज़मीन से उगने वाली चीज़ों और खु़द उन लोगों के और उन चीज़ों के जिनकी उन्हें ख़बर नहीं सबके जोड़े पैदा किए (36)
  • और मेरी क़ुदरत की एक निशानी रात है जिससे हम दिन को खींच कर निकाल लेते (जाएल कर देते) हैं तो उस वक़्त ये लोग अँधेरे में रह जाते हैं (37)
  • और (एक निशानी) आफताब है जो अपने एक ठिकाने पर चल रहा है ये (सबसे) ग़ालिब वाकि़फ (खु़दा) का (वाधा हुआ) अन्दाज़ा है (38)
  • और हमने चाँद के लिए मंजि़लें मुक़र्रर कर दीं हैं यहाँ तक कि हिर फिर के (आखि़र माह में) खजूर की पुरानी टहनी का सा (पतला टेढ़ा) हो जाता है (39)
  • न तो आफताब ही से ये बन पड़ता है कि वह माहताब को जा ले और न रात ही दिन से आगे बढ़ सकती है (चाँद, सूरज, सितारे) हर एक अपने-अपने आसमान (मदार) में चक्कर लगा रहें हैं (40)
  • और उनके लिए (मेरी कु़दरत) की एक निशानी ये है कि उनके बुज़ुर्गों को (नूह की) भरी हुयी कश्ती में सवार किया (41)
  • और उस कशती के मिसल उन लोगों के वास्ते भी वह चीज़े (कश्तियाँ) जहाज़ पैदा कर दी (42)
  • जिन पर ये लोग सवार हुआ करते हैं और अगर हम चाहें तो उन सब लोगों को डुबा मारें फिर न कोई उन का फरियाद रस होगा और न वह लोग छुटकारा ही पा सकते हैं (43)
  • मगर हमारी मेहरबानी से और चूँकि एक (ख़ास) वक़्त तक (उनको) चैन करने देना (मंज़ूर) है (44)
  • और जब उन कुफ़्फ़ार से कहा जाता है कि इस (अज़ाब से) बचो (हर वक़्त तुम्हारे साथ-साथ) तुम्हारे सामने और तुम्हारे पीछे (मौजूद) है ताकि तुम पर रहम किया जाए (45)
  • (तो परवाह नहीं करते) और उनकी हालत ये है कि जब उनके परवरदिगार की निशानियों में से कोई निशानी उनके पास आयी तो ये लोग मुँह मोड़े बग़ैर कभी नहीं रहे (46)
  • और जब उन (कुफ़्फ़ार) से कहा जाता है कि (माले दुनिया से) जो खु़दा ने तुम्हें दिया है उसमें से कुछ (खु़दा की राह में भी) ख़र्च करो तो (ये) कुफ़्फ़ार ईमानवालों से कहते हैं कि भला हम उस शख़्स को खिलाएँ जिसे (तुम्हारे ख़्याल के मुवाफि़क़) खु़दा चाहता तो उसको खु़द खिलाता कि तुम लोग बस सरीही गुमराही में (पड़े हुए) हो (47)
  • और कहते हैं कि (भला) अगर तुम लोग (अपने दावे में सच्चे हो) तो आखि़र ये (क़यामत का) वायदा कब पूरा होगा (48)
  • (ऐ रसूल) ये लोग एक सख़्त चिंघाड़ (सूर) के मुनतजि़र हैं जो उन्हें (उस वक़्त) ले डालेगी (49)
  • जब ये लोग बाहम झगड़ रहे होगें फिर न तो ये लोग वसीयत ही करने पायेंगे और न अपने लड़के बालों ही की तरफ लौट कर जा सकेगें (50)
  • और फिर (जब दोबारा) सूर फूँका जाएगा तो उसी दम ये सब लोग (अपनी-अपनी) क़ब्रों से (निकल-निकल के) अपने परवरदिगार की बारगाह की तरफ चल खड़े होगे (51)
  • और (हैरान होकर) कहेगें हाए अफसोस हम तो पहले सो रहे थे हमें ख़्वाबगाह से किसने उठाया (जवाब आएगा) कि ये वही (क़यामत का) दिन है जिसका खु़दा ने (भी) वायदा किया था (52)
  • और पैग़म्बरों ने भी सच कहा था (क़यामत तो) बस एक सख़्त चिंघाड़ होगी फिर एका एकी ये लोग सब के सब हमारे हुजू़र में हाजि़र किए जाएँगे (53)
  • फिर आज (क़यामत के दिन) किसी शख़्स पर कुछ भी ज़ुल्म न होगा और तुम लोगों को तो उसी का बदला दिया जाएगा जो तुम लोग (दुनिया में) किया करते थे (54)
  • बेहश्त के रहने वाले आज (रोजे़ क़यामत) एक न एक मशग़ले में जी बहला रहे हैं (55)
  • वह अपनी बीवियों के साथ (ठन्डी) छाँव में तकिया लगाए तख़्तों पर (चैन से) बैठे हुए हैं (56)
  • बहिश्त में उनके लिए (ताज़ा) मेवे (तैयार) हैं और जो वह चाहें उनके लिए (हाजि़र) है (57)
  • मेहरबान परवरदिगार की तरफ से सलाम का पैग़ाम आएगा (58)
  • और (एक आवाज़ आएगी कि) ऐ गुनाहगारों तुम लोग (इनसे) अलग हो जाओ (59)
  • ऐ आदम की औलाद क्या मैंने तुम्हारे पास ये हुक्म नहीं भेजा था कि (ख़बरदार) शैतान की परसतिश न करना वह यक़ीनी तुम्हारा खुल्लम खुल्ला दुश्मन है (60)
  • और ये कि (देखो) सिर्फ मेरी इबादत करना यही (नजात की) सीधी राह है (61)
  • और (बावजूद इसके) उसने तुममें से बहुतेरों को गुमराह कर छोड़ा तो क्या तुम (इतना भी) नहीं समझते थे (62)
  • ये वही जहन्नुम है जिसका तुमसे वायदा किया गया था (63)
  • तो अब चूँकि तुम कुफ्र करते थे इस वजह से आज इसमें (चुपके से) चले जाओ (64)
  • आज हम उनके मुँह पर मुहर लगा देगें और (जो) कारसतानियाँ ये लोग दुनिया में कर रहे थे खु़द उनके हाथ हमको बता देगें और उनके पाँव गवाही देगें (65)
  • और अगर हम चाहें तो उनकी आँखों पर झाडू फेर दें तो ये लोग राह को पड़े चक्कर लगाते ढूँढते फिरें मगर कहाँ देख पाँएगे (66)
  • और अगर हम चाहे तो जहाँ ये हैं (वहीं) उनकी सूरतें बदल (करके) (पत्थर मिट्टी बना) दें फिर न तो उनमें आगे जाने का क़ाबू रहे और न (घर) लौट सकें (67)
  • और हम जिस शख़्स को (बहुत) ज़्यादा उम्र देते हैं तो उसे खि़लक़त में उलट (कर बच्चों की तरह मजबूर कर) देते हैं तो क्या वह लोग समझते नहीं (68)
  • और हमने न उस (पैग़म्बर) को शेर की तालीम दी है और न शायरी उसकी शान के लायक़ है ये (किताब) तो बस (निरी) नसीहत और साफ-साफ कु़रान है (69)
  • ताकि जो जि़न्दा (दिल आकि़ल) हों उसे (अज़ाब से) डराए और काफि़रों पर (अज़ाब का) क़ौल साबित हो जाए (और हुज्जत बाक़ी न रहे) (70)
  • क्या उन लोगों ने इस पर भी ग़ौर नहीं किया कि हमने उनके फायदे के लिए चारपाए उस चीज़ से पैदा किए जिसे हमारी ही क़ुदरत ने बनाया तो ये लोग (ख्वाहमाख्वाह) उनके मालिक बन गए (71)
  • और हम ही ने चार पायों को उनका मुतीय बना दिया तो बाज़ उनकी सवारियां हैं और बाज़ को खाते हैं (72)
  • और चार पायों में उनके (और) बहुत से फायदे हैं और पीने की चीज़ (दूध) तो क्या ये लोग (इस पर भी) शुक्र नहीं करते (73)
  • और लोगों ने ख़ुदा को छोड़कर (फ़र्ज़ी माबूद बनाए हैं ताकि उन्हें उनसे कुछ मद्द मिले हालाँकि वह लोग उनकी किसी तरह मद्द कर ही नहीं सकते (74)
  • और ये कुफ़्फ़ार उन माबूदों के लशकर हैं (और क़यामत में) उन सबकी हाजि़री ली जाएगी (75)
  • तो (ऐ रसूल) तुम इनकी बातों से आज़ुरदा ख़ातिर (पेरशान) न हो जो कुछ ये लोग छिपा कर करते हैं और जो कुछ खुल्लम खुल्ला करते हैं-हम सबको यक़ीनी जानते हैं (76)
  • क्या आदमी ने इस पर भी ग़ौर नहीं किया कि हम ही ने इसको एक ज़लील नुत्फे़ से पैदा किया फिर वह यकायक (हमारा ही) खुल्लम खुल्ला मुक़ाबिल (बना) है (77)
  • और हमारी निसबत बातें बनाने लगा और अपनी खि़लक़त (की हालत) भूल गया और कहने लगा कि भला जब ये हड्डियाँ (सड़गल कर) ख़ाक हो जाएँगी तो (फिर) कौन (दोबारा) जि़न्दा कर सकता है (78)
  • (ऐ रसूल) तुम कह दो कि उसको वही जि़न्दा करेगा जिसने उनको (जब ये कुछ न थे) पहली बार जि़न्दा कर (रखा) (79)
  • और वह हर तरह की पैदाइश से वाकि़फ है जिसने तुम्हारे वास्ते (मिखऱ् और अफ़ार के) हरे दरख़्त से आग पैदा कर दी फिर तुम उससे (और) आग सुलगा लेते हो (80)
  • (भला) जिस (खु़दा) ने सारे आसमान और ज़मीन पैदा किए क्या वह इस पर क़ाबू नहीं रखता कि उनके मिस्ल (दोबारा) पैदा कर दे हाँ (ज़रूर क़ाबू रखता है) और वह तो पैदा करने वाला वाकि़फ़कार है (81)
  • उसकी शान तो ये है कि जब किसी चीज़ को (पैदा करना) चाहता है तो वह कह देता है कि “हो जा” तो (फौरन) हो जाती है (82)
  • तो वह ख़ुद (हर नफ़्स से) पाक साफ़ है जिसके क़ब्ज़े कु़दरत में हर चीज़ की हिकमत है और तुम लोग उसी की तरफ लौट कर जाओगे (83)

Surah Yaseen in English

Bismillahi Rahmanir Rahim

  • 1. Yaseen
  • 2. Wal Quraanil Hakeem
  • 3. Innaka Laminal Mursaleen
  • 4. Ala Siratim Mustaqeem
  • 5. Tanzeelal Azizir Raheem
  • 6. Litunzira Qaumam Ma Unzira Aabauhum Fahum Ghafiloon
  • 7. Laqad Haqqal Qaulu Ala Aksarihim Fahum La Uaminoon
  • 8. Inna Ja Alna Fi Aanaqihim Aglalan Fahiya IlalAzqani Fahum Muqmahoon
  • 9. Wajalna Mim Bayni Aydihim Saddaw Wamin Khlfihim Saddan Fa Agshay Nahum Fahum La Yubsiroon
  • 10. Wasa Waun Alayhim A Anzar Tahum Am Lam Tunzirhum La Yuaminoon
  • 11. Innama Tunziru Manit Taba Azzikra Wa Khashiyar Rahmana Bilghaybi Fabash shirhu Bimagh Firatiw Waajrun Kareem
  • 12. Inna Nuhyil Mauta Wanaktubu Ma Qaddamu Wa Aasa rahum Wakulla Shay in Ahsaynahu Fi Imamim Mubeen
  • 13. Wazrib Lahum Masalan As habal Qaryah Iz Ja Ahal Mursaloon
  • 14. Iz Arsalna Ilayhimus Naini Fakaz Zaboohuma Fa Az Zazna Bisalisin Faqalu Inna Ilikum Mursaloon
  • 15. Qaloo Maa Antum Illa Basharum Misluna Wama Anzalar Rahmanu Min Shay in In Antum IllaTakziboon
  • 16. Qaloo Rabbuna Yaalamu Inna Ilaykum Lamur saloon
  • 17. Wama Alayna Illal Balaghul Mubeen
  • 18. Qalu Inna Tatay yarna Bikum Lail Lam Tantahu Lanarju Man Nakum Wala Yamas San Nakum Minna Azabun Aleem
  • 19. Qaloo Taairukum Ma Akum Ain Zukkirtum Bal Antum Qaumum Musrifoon
  • 20. Waja Amin Aqsal Madeenati Rajuluy Yasaa Qala Ya Qaumit Tabi Ul Mursaleen
  • 21. It Tabiu Mal La Yas alukum Ajraw Wahum Muhtadoon
  • 22. Wamaliya La Aabudul Lazi Fatarani Wailaihi Turjaoon
  • 23. A Atakhizu Min Doonihi Aalihatan Iy Yuridnir Rahmanu Bizurril La Tughni Ani Shafa Atuhum Shayaw Wala Yunqizoon
  • 24. Inni Izal Lafi Zalalim Mubeen
  • 25. Inni Amantu Birabbikum Fasmaoon
  • 26. Qeelad Khulil Jannah Qala Yalayta Qawmiy ya Alamoon
  • 27. Bima Ghafarali Rabbi Wa Ja Alani Minal Mukramin
  • 28. Wama Anzalna Ala Qaumihi Mim Badihi Min Jundim Minas Samai Wama Kunna Munzilin
  • 29. In Kanat Illa Say hataw Wahidatan Faiza Hum Khamidoon
  • 30. Ya Hasratan Alal Ibaad Maa Ya Teehim Mir Rasoolin Illa Kanu Bihi Yastah Zioon
  • 31. Alam Yarau Kam Ahlakna Qablahum Minal Qurooni Annahum Ilayhim La Yarjioon
  • 32. Wa in Kullul Lamma Jameeul Ladayna Muhzaroon
  • 33. Wayatul Lahumul Arzul Maytah Ahyaynaha Wa Akhrajna Minha Habban Faminhu Yakuloon
  • 34. Wa ja Alna Feeha Jannatim Min Nakheeliw WaAnabiw Wafaj jarna Feeha Minal Uyoon
  • 35. Liya Kuloo Min Samarihi Wama Amilathu Aydeehim Afala Yashkuroon
  • 36. Subhanal Lazi Khalaqal Azwaja Kul Laha Mimma Tumbitul Arzu Wamin Anfusihim Wamimma La Yalamoon
  • 37. Wa Ayatul Lahumul Layl Naslakhu Minhun Nahara Fa Iza Hum Muzlimoon
  • 38. Wash Shamsu Tajree Limusta Qarril Laha Zalika Taqdeerul Azizil Aleem
  • 39. Wal qamara Qaddar Nahu Manazila Hatta Aada Kal urjoonil Qadeem
  • 40. Lash Shamsu Yambaghi Laha An Tudrikal Qamara Walal Laylu Sabiqun Nahaar Wakullun Fee Falakiy Yasbahoon
  • 41. Waayatul Lahum Anna Hamalna Zurriyyatahum Fil Fulkil Mash Hooon
  • 42. Wakhalaqna Lahum Mim Mislihi Ma Yarkaboon
  • 43. Wain Nasha Nugrikhum Fala Sareekha Lahum Wala Hum Yunqazoon
  • 44. Illa Rahmatam Minna Wamata An Ilahin
  • 45. Wa iza Qeela Lahumut Taqu Ma Bayna Aydeekum Wama Khalfakum Laallakum Turhamoon
  • 46. Wama Ta Teehim Min Aayatim Min Aayati Rabbihim Illa Kanu Anha Mu a Rezeen
  • 47. Wa iza Qeela Lahum Anfiqu Mimma Razaqa Kumullah Qalal Lazina Kafaru Lillazina Aamanu Anutimu Mal Lau Yashau Lahu Atamah InAntum Illa Fi Zalalim Mubeen
  • 48. Wa Yaqoo loona Mata Hazal Wa Adu In Kuntum Sadiqeen
  • 49. Ma Yanzuruna Illa Sayhataw Wahidatan Ta Khuzuhum Wahum Yakhis Simoon
  • 50. Fala Yasta Teeuna Tawsiyatw Wala Ila Ahlihim Yarjioon
  • 51. Wa Nufikha Fis Soori Fa Iza Hum Minal Ajdasi Ila Rabbihim Yan siloon
  • 52. Qaloo Yawailana Mam Ba Asana Mim Marqadina Haza Ma Wa Adar Rahmanu Wa sadaqal Mursaloon
  • 53. In Kanat Illa Sayhataw Wahidatan Faiza hum Jameeul Ladayna Muhzaroon
  • 54. Falyauma Tuzlamu Nafsun Shay Aw Wala Tujzauna Illa Ma Kuntum Ta’maloon
  • 55. Inna As habal Jannatil Yauma Fi Shugulin Fakihun
  • 56. Hum Wa Azwaju hum Fi Zilalin Alal Araiki Mutta kioon
  • 57. Lahum Feeha Fakihataw Walahum Ma YadDaoon
  • 58. Salamun Qaulam Mir Rabbir Raheem
  • 59. Wamtazul Yauma Ayyuhal Mujrimoon
  • 60. Alam Aahad IlaikumYa Bani Aadama Al La Tabudush Shaytaan Innahu Lakum Adwwum Mubeen
  • 61. Wa Ania Budooni Haza Siratum Mustaqeem
  • 62. Wa laqad Azalla Minkum JibilLan Kaseera Afalam Takoonu Taaqiloon
  • 63. Hazihi Jahannamul Lati Kuntum Tooadoon
  • 64. Islauhal Yauma Bima Kuntum Takfuroon
  • 65. Alyauma Nakhtimu Ala Afwa hihim Watukal limuna Aydeehim Watash Hadu Arjuluhum Bima Kanu Yaksiboon
  • 66. Walau Nashau Latamasna Ala Aayunihim Fastabaqus Sirata Fanna Yubsiroon
  • 67. Walau Nashau Lamasakhna Ala Makanatihim Famastatau Muziyyaw Wala Yarjioon
  • 68. Waman Nuammirhu Nunakkishu Fil Khalq Afala Yaqiloon
  • 69. Wama Allamnahush Shira Wama Yambagi Lah In Hua Illa Zikruw Wa quraanim Mubeen
  • 70. Liyunzira Man Kana Hayyaw Wayahiqqal Qaulu Alal Kafireen
  • 71. Awalam Yarau Anna Khalaqna Lahum Mimma Amilat Aydina An aaman Fahum Laha Malikoon
  • 72. Wazallal Naha Lahum Faminha Rakoobahum Waminha Yakuloon
  •  73. Walahum Fiha Manafiu Wa Masharibu Afala Yashkuroon
  • 74. Wat Takhazu Min Dunil Lahi Alihatal La Allahum Yunsaroon
  • 75. La Yastatioona Nasrahum Wahum Lahum Jundum Muhzaroon
  • 76. Fala Yahzunka Qauluhum Inna Na Lamu Wama Yusirroona Wama Yualinoon
  • 77. Awalam YaralInsanu Inna Khalaqnahu Min Nutfatin Faiza Huwa Khaseemum Mubeen
  • 78. Wazaraba Lana Masalaw Wanasiya Khalqah Qala May Yuhyil Izama Wahiya Rameem
  • 79. Qul Yuhyihal Lazi Ansha Aha Awwala Marrah Wahua Bikulli Khalqin Aleem
  • 80. Allazi Ja Ala Lakum Minash Shajaril Akhzari Naran Faiza Antum Minhu Tooqidoon
  • 81. Awa laisal Lazi Khalaqas Samawati Wal Arza Biqadirin Ala Ayyakhluqa Mislahum Bala Wahua Khallaqul Aleem
  • 82. Innama Amruhu Iza Arada Shayan Ay Yaqoola Lahu Kun Fayakoon
  • 83. Fasubhanal Lazi Biyadihi Malakootu Kulli Shayiw WaIlyhi Turjaoon

Surah Yaseen English Translation

In the name of Allah, Most Gracious, Most Merciful.

  1. Ya Sin.
  2. By the Qur’an, full of Wisdom,
  3. Thou art indeed one of the messengers,
  4. On a Straight Way.
  5. It is a Revelation sent down by (Him), the Exalted in Might, Most Merciful.
  6. In order that thou mayest admonish a people, whose fathers had received no admonition, and who therefore remain heedless (of the Signs of Allah).
  7. The Word is proved true against the greater part of them: for they do not believe.
  8. We have put yokes round their necks right up to their chins, so that their heads are forced up (and they cannot see).
  9. And We have put a bar in front of them and a bar behind them, and further, We have covered them up; so that they cannot see.
  10. The same is it to them whether thou admonish them or thou do not admonish them: they will not believe.
  11. Thou canst but admonish such a one as follows the Message and fears the (Lord) Most Gracious, unseen: give such a one, therefore, good tidings, of Forgiveness and a Reward most generous.
  12. Verily We shall give life to the dead, and We record that which they send before and that which they leave behind, and of all things have We taken account in a clear Book (of evidence).
  13. Set forth to them, by way of a parable, the (story of) the Companions of the City. Behold!, there came messengers to it.
  14. When We (first) sent to them two messengers, they rejected them: But We strengthened them with a third: they said, “Truly, we have been sent on a mission to you.”
  15. The (people) said: “Ye are only men like ourselves; and (Allah) Most Gracious sends no sort of revelation: ye do nothing but lie.”
  16. They said: “Our Lord doth know that we have been sent on a mission to you:
  17. “And our duty is only to proclaim the clear Message.”
  18. The (people) said: “for us, we augur an evil omen from you: if ye desist not, we will certainly stone you. And a grievous punishment indeed will be inflicted on you by us.”
  19. They said: “Your evil omens are with yourselves: (deem ye this an evil omen). If ye are admonished? Nay, but ye are a people transgressing all bounds!”
  20. Then there came running, from the farthest part of the City, a man, saying, “O my people! Obey the messengers:
  21. “Obey those who ask no reward of you (for themselves), and who have themselves received Guidance.
  22. “It would not be reasonable in me if I did not serve Him Who created me, and to Whom ye shall (all) be brought back.
  23. “Shall I take (other) gods besides Him? If (Allah) Most Gracious should intend some adversity for me, of no use whatever will be their intercession for me, nor can they deliver me.
  24. “I would indeed, if I were to do so, be in manifest Error.
  25. “For me, I have faith in the Lord of you (all): listen, then, to me!”
  26. It was said: “Enter thou the Garden.” He said: “Ah me! Would that my People knew (what I know)!-
  27. “For that my Lord has granted me Forgiveness and has enrolled me among those held in honour!”
  28. And We sent not down against his People, after him, any hosts from heaven, nor was it needful for Us so to do.
  29. It was no more than a single mighty Blast, and behold! they were (like ashes) quenched and silent.
  30. Ah! Alas for (My) Servants! There comes not a messenger to them but they mock him!
  31. See they not how many generations before them we destroyed? Not to them will they return:
  32. But each one of them all – will be brought before Us (for judgment).
  33. A Sign for them is the earth that is dead: We do give it life, and produce grain therefrom, of which ye do eat.
  34. And We produce therein orchard with date-palms and vines, and We cause springs to gush forth therein:
  35. That they may enjoy the fruits of this (artistry): It was not their hands that made this: will they not then give thanks?
  36. Glory to Allah, Who created in pairs all things that the earth produces, as well as their own (human) kind and (other) things of which they have no knowledge.
  37. And a Sign for them is the Night: We withdraw therefrom the Day, and behold they are plunged in darkness;
  38. And the sun runs his course for a period determined for him: that is the decree of (Him), the Exalted in Might, the All-Knowing.
  39. And the Moon,- We have measured for her mansions (to traverse) till she returns like the old (and withered) lower part of a date-stalk.
  40. It is not permitted to the Sun to catch up the Moon, nor can the Night outstrip the Day: Each (just) swims along in (its own) orbit (according to Law).
  41. And a Sign for them is that We bore their race (through the Flood) in the loaded Ark;
  42. And We have created for them similar (vessels) on which they ride.
  43. If it were Our Will, We could drown them: then would there be no helper (to hear their cry), nor could they be delivered,
  44. Except by way of Mercy from Us, and by way of (world) convenience (to serve them) for a time.
  45. When they are told, “Fear ye that which is before you and that which will be after you, in order that ye may receive Mercy,” (they turn back).
  46. Not a Sign comes to them from among the Signs of their Lord, but they turn away therefrom.
  47. And when they are told, “Spend ye of (the bounties) with which Allah has provided you,” the Unbelievers say to those who believe: “Shall we then feed those whom, if Allah had so willed, He would have fed, (Himself)?- Ye are in nothing but manifest error.”
  48. Further, they say, “When will this promise (come to pass), if what ye say is true?”
  49. They will not (have to) wait for aught but a single Blast: it will seize them while they are yet disputing among themselves!
  50. No (chance) will they then have, by will, to dispose (of their affairs), nor to return to their own people!
  51. The trumpet shall be sounded, when behold! from the sepulchres (men) will rush forth to their Lord!
  52. They will say: “Ah! Woe unto us! Who hath raised us up from our beds of repose?”… (A voice will say:) “This is what (Allah) Most Gracious had promised. And true was the word of the messengers!”
  53. It will be no more than a single Blast, when lo! they will all be brought up before Us!
  54. Then, on that Day, not a soul will be wronged in the least, and ye shall but be repaid the meeds of your past Deeds.
  55. Verily the Companions of the Garden shall that Day have joy in all that they do;
  56. They and their associates will be in groves of (cool) shade, reclining on Thrones (of dignity);
  57. (Every) fruit (enjoyment) will be there for them; they shall have whatever they call for;
  58. “Peace!” – a word (of salutation) from a Lord Most Merciful!
  59. “And O ye in sin! Get ye apart this Day!
  60. “Did I not enjoin on you, O ye Children of Adam, that ye should not worship Satan; for that he was to you an enemy avowed?-
  61. “And that ye should worship Me, (for that) this was the Straight Way?
  62. “But he did lead astray a great multitude of you. Did ye not, then, understand?
  63. “This is the Hell of which ye were (repeatedly) warned!
  64. “Embrace ye the (fire) this Day, for that ye (persistently) rejected (Truth).”
  65. That Day shall We set a seal on their mouths. But their hands will speak to us, and their feet bear witness, to all that they did.
  66. If it had been our Will, We could surely have blotted out their eyes; then should they have run about groping for the Path, but how could they have seen?
  67. And if it had been Our Will, We could have transformed them (to remain) in their places; then should they have been unable to move about, nor could they have returned (after error).
  68. If We grant long life to any, We cause him to be reversed in nature: Will they not then understand?
  69. We have not instructed the (Prophet) in Poetry, nor is it meet for him: this is no less than a Message and a Qur’an making things clear:
  70. That it may give admonition to any (who are) alive, and that the charge may be proved against those who reject (Truth).
  71. See they not that it is We Who have created for them – among the things which Our hands have fashioned – cattle, which are under their dominion?-
  72. And that We have subjected them to their (use)? of them some do carry them and some they eat:
  73. And they have (other) profits from them (besides), and they get (milk) to drink. Will they not then be grateful?
  74. Yet they take (for worship) gods other than Allah, (hoping) that they might be helped!
  75. They have not the power to help them: but they will be brought up (before Our Judgment-seat) as a troop (to be condemned).
  76. Let not their speech, then, grieve thee. Verily We know what they hide as well as what they disclose.
  77. Doth not man see that it is We Who created him from sperm? yet behold! he (stands forth) as an open adversary!
  78. And he makes comparisons for Us, and forgets his own (origin and) Creation: He says, “Who can give life to (dry) bones and decomposed ones (at that)?”
  79. Say, “He will give them life Who created them for the first time! for He is Well-versed in every kind of creation!-
  80. “The same Who produces for you fire out of the green tree, when behold! ye kindle therewith (your own fires)!
  81. “Is not He Who created the heavens and the earth able to create the like thereof?” – Yea, indeed! for He is the Creator Supreme, of skill and knowledge (infinite)!
  82. Verily, when He intends a thing, His Command is, “be”, and it is!
  83. So glory to Him in Whose hands is the dominion of all things: and to Him will ye be all brought back.

सवाल - जवाब

सवाल: क्या सूरह यासीन को रोजाना पढ़ना चाहिए?

जवाब: हां, सूरह यासीन को रोजाना पढ़ने से कई तरह की बरकतें, कई बालाओ से छुटकारा और दिल की इच्छा पूरी होती है।

सवाल: सूरह यासीन मरने वाले के पास पढ़ना से क्या होगा?

जवाब: जब कोई शख्स आखिरी सांस लेते समय या जिंदगी के आखिरी दिनों में जब तबियत खराब हो तब सूरह यासीन को पढ़ा जाता है। और इसे पढ़ना सुन्नत है। सूरह यासीन को पढ़ने से जान निकलने की तकलीफ आसान हो जाती है।

सवाल: सूरह यासीन को पढ़ने में कितना समय लगता है?

जवाब: यह आयत बहुत लंबी नहीं है, आयत को समझना और याद रखना अपेक्षाकृत आसान है। यह इस बात पर निर्भर करता है कि व्यक्ति कितना प्रेरित है, और वह कितना प्रयास करने को तैयार है।  इस सूरह को याद करने में 6 से 10 दिन लग सकते हैं।

सवाल: सूरह यासीन का क्या अर्थ है?

जवाब: सूरह कुरान को एक दिव्य स्रोत के रूप में स्थापित करने पर केंद्रित है, और यह उन लोगों के भाग्य की चेतावनी देता है जो भगवान के रहस्योद्घाटन का मजाक उड़ाते हैं और जिद्दी हैं। सूरह उन दंडों के बारे में बताती है जो अविश्वासियों की पिछली पीढ़ियों को वर्तमान और आने वाली पीढ़ियों के लिए चेतावनी के रूप में चित्रित करती है।

सवाल: हिंदी में कुरान शरीफ कैसे पढ़ा जाता है?

जवाब: कुरान शरीफ अच्छी आवाज़ से पढ़ना चाहिए- लेकिन गाने की तरह नहीं पढ़ना चाहिए क्योंकि इस तरह पढ़ना नाजाइज है। कुरान शरीफ देखकर पढ़ना, बिना देखे पढ़ने से बेहतर है। अच्छा य है कि वजू करके किबला रुख साफ़ कपड़े पहनकर तिलावत करें और तिलावत के शुरू में अऊजो बिल्लाही पढ़ना वाजिब है और सूरह के शुरू में बिस्मिल्लाह पढ़ना सुन्नत है।

सवाल: सूरह यासीन कौन से पेज पर है?

जवाब: सूरह यासीन क़ुरआन की 36 वीं सूरह है। यह पारा नंबर 22 और 23 में है।

सवाल: सूरह यासीन के बारे में क्या खास है?

जवाब: सूरह अल्लाह की संप्रभुता और पुनरुत्थान के अस्तित्व को दोहराता है। इसे मक्का सूरा के रूप में वर्गीकृत किया गया है, जिसका मुख्य विषय इस्लाम की कुछ बुनियादी मान्यताओं, विशेष रूप से मृत्यु के बाद जीवन में विश्वास की व्याख्या करना है।

सवाल: सूरह यासीन कुरान का दिल क्यों है?

जवाब: ‘यासीन’- पैगम्बरों का मुखिया है, मुहम्मद, साथ ही यह सूरह, जो विशेष रूप से मुहम्मद से संबंधित है, कुरान का दिल बन जाता है जैसे मुहम्मद स्वयं अस्तित्व की दुनिया का दिल है। इसके सभी छंदों में से, इस सूरह की पहली सूरह मुहम्मद को सभी दिव्य दूतों के प्रमुख के रूप में संबोधित करती है।

सवाल: सूरह यासीन को पढ़ने का सही समय क्या है?

जवाब: कुरान की किसी भी सूरह या कुरान की किसी भी आयत को पढ़ने का कोई तय वक़्त नहीं लेकिन फजर नमाज़ या ईशा नमाज़ के बाद सूरह यासीन की तिलावत करना अच्छा मना जाता है।

सवाल: बच्चे की पैदायश के वक़्त सूरह यासीन पढ़ना कैसा है?

जवाब: जब बच्चे की पैदाइश हो यानी बच्चे के पैदा होने के वक़्त दर्द के मौके पर इस सूरह को पढ़ा जाता है । सूरह यासीन को पानी पर 3 बार दम करके पिलाने से विलादत में आसानी होती है।

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