41 सूरह हा मीम अस सजदह, सूरह फुसिलत हिंदी में पेज 2

सूरह हा मीम अस सजदह, सूरह फुसिलत हिंदी में | Surah Fussilat | Surah ha mim as-Sajdah in Hindi

  1. ज़ालि क जज़ा-उ अअ्दा-इल्लाहिन्नारु लहुम् फ़ीहा दारुल्- ख़ुल्दि जज़ा-अम् बिमा कानू बिआयातिना यज्हदून 
    ख़़ुदा के दुशमनों का बदला है कि वह जो हमरी आयतों से इन्कार करते थे उसकी सज़ा में उनके लिए उसमें हमेशा (रहने) का घर है,
  2. व क़ालल्लज़ी – न क – फ़रू रब्बना अरिनल्लज़ैनि अज़ल्लाना मिनल्-जिन्नि वल्-इन्सि नज्अ़ल्हुमा तह्-त अक़्दामिना लि-यकूना मिनल्-अस्फ़लीन 
    और (क़यामत के दिन) कुफ़्फ़ार कहेंगे कि ऐ हमारे परवरदिगार जिनों और इन्सानों में से जिन लोगों ने हमको गुमराह किया था (एक नज़र) उनको हमें दिखा दे कि हम उनको पाँव तले (रौन्द) डालें ताकि वह ख़ूब ज़लील हों
  3. इन्नल्लज़ी-न क़ालू रब्बुनल्लाहु सुम्मस्-तक़ामू त तनज़्ज़लु अ़लैहिमुल्-मलाइ-कतु अल्ला तख़ाफ़ू व ला तह्ज़नू व अब्शिरू बिल्-जन्नतिल्लती कुन्तुम् तू-अ़दून 
    और जिन लोगों ने (सच्चे दिल से) कहा कि हमारा परवरदिगार तो (बस) ख़ुदा है, फिर वह उसी पर भी क़ायम भी रहे उन पर मौत के वक़्त (रहमत के) फ़रिश्ते नाजि़ल होंगे (और कहेंगे) कि कुछ ख़ौफ न करो और न ग़म खाओ और जिस बेहिष्त का तुमसे वायदा किया गया था उसकी खुशियाँ मनाओ
  4. नह्नु औलिया-उकुम् फिल् हयातिद्-दुन्या व फिल्- आख़िरति व लकुम् फ़ीहा मा तश्तही अन्फ़ुसुकुम् व लकुम् फ़ीहा मा तद्-दअून
    हम दुनिया की जि़न्दगी में तुम्हारे दोस्त थे और आख़ेरत में भी तुम्हारे (रफ़ीक़) हैं और जिस चीज़ का भी तुम्हार जी चाहे बेहिष्त में तुम्हारे वास्ते मौजूद है और जो चीज़ तलब करोगे वहाँ तुम्हारे लिए (हाजि़र) होगी
  5. नुज़ुलम् मिन् ग़फ़ूरिर्रहीम *
    (ये) बख्शने वाले मेहरबान (ख़़ुदा) की तरफ़ से (तुम्हारी मेहमानी है)
  6. व मन् अह्सनु क़ौलम् मिम्-मन् दआ़ इलल्लाहि व अ़मि-ल सालिहंबू-व क़ा-ल इन्ननी मिनल्-मुस्लिमीन 
    और इस से बेहतर किसकी बात हो सकती है जो (लोगों को) ख़़ुदा की तरफ़ बुलाए और अच्छे अच्छे काम करे और कहे कि मैं भी यक़ीनन (ख़ुदा के) फ़रमाबरदार बन्दों में हूँ
  7. व ला तस्तविल्-ह-स- नतु व लस्सय्यि-अतु इद्फ़अ् बिल्लती हि-य अह्सनु फ़-इज़ल्-लज़ी बैन-क व बैनहू अ़दा-वतुन् क- अन्नहू वलिय्युन् हमीम 
    और भलाई बुराई (कभी) बराबर नहीं हो सकती तो (सख़्त कलामी का) ऐसे तरीके से जवाब दो जो निहायत अच्छा हो (ऐसा करोगे) तो (तुम देखोगे जिस में और तुममें दुशमनी थी गोया वह तुम्हारा दिल सोज़ दोस्त है
  8. व मा युलक़्क़ाहा इल्लल्लज़ी-न स-बरु व मा युलक़्क़ाहा इल्ला ज़ू हज़्ज़िन् अ़ज़ीम
    ये बात बस उन्हीं लोगों को हासिल हुई है जो सब्र करने वाले हैं और उन्हीं लोगों को हासिल होती है जो बड़े नसीबवर हैं
  9. व इम्मा यन्-ज़ग़न्न-क मिनश्- शैतानि नज़्ग़ुनू फ़स्तअिज़ू बिल्लाहि, इन्नहू हुवस्समीअुल्-अ़लीम 
    और अगर तुम्हें शैतान की तरफ़ से वसवसा पैदा हो तो ख़ुदा की पनाह माँग लिया करो बेशक वह (सबकी) सुनता जानता है
  10. व – मिन् आयातिहिल्लैलु वन्नहारु वश्शम्सु वल्क़-मरु, ला तस्जुदू लिश्शम्सि व ला लिल्क़-मरि वस्जुदू लिल्लाहिल्लज़ी ख़-ल- क़हुन्-न इन् कुन्तुम् इय्याहु तअ्बुदून 
    और उसकी (कुदरत की) निशानियों में से रात और दिन और सूरज और चाँद हैं तो तुम लोग न सूरज को सजदा करो और न चाँद को, और अगर तुम ख़़ुदा ही की इबादत करनी मंज़ूर रहे तो बस उसी को सजदा करो जिसने इन चीज़ों को पैदा किया है
  11. फ़-इनिस्तक्बरू फ़ल्लज़ी – न अिन्-द रब्बि-क युसब्बिहू-न लहू बिल्लैलि वन्नहारि व हुम् ला यस्-अमून
    पस अगर ये लोग सरकशी करें तो (ख़़ुदा को भी उनकी परवाह नहीं) वो लोग (फ़रिश्ते) तुम्हारे परवरदिगार की बारगाह में हैं वह रात दिन उसकी तसबीह करते रहते हैं और वह लोग उकताते भी नहीं
  12. व मिन् आयातिही अन्न-क तरल् अर्ज़ ख़ाशि-अ़तन् फ़-इज़ा अन्ज़ल्ना अ़लैहल् मा-अह्तज़्ज़त् व र-बत्, इन्नल्लज़ी अह्याहा ल-मुह्यिल्-मौता, इन्नहू अ़ला कुल्लि शैइन् क़दीर 
    उसकी क़ुदरत की निशानियों में से एक ये भी है कि तुम ज़मीन को ख़ुश्क और बेगयाह देखते हो फिर जब हम उस पर पानी बरसा देते हैं तो लहलहाने लगती है और फूल जाती है जिस ख़ुदा ने (मुर्दा) ज़मीन को जि़न्दा किया वह यक़ीनन मुर्दों को भी जिलाएगा बेशक वह हर चीज़ पर क़ादिर है
  13. इन्नल्लज़ी-न युल्हिदू-न फ़ी आयातिना ला यख़्फ़ौ न अ़लैना, अ-फ़-मंय्युल्क़ा फ़िन्नारि ख़ैरुन् अम्-मंय्यअ्ती आमिनंय्यौमल् क़ियामति, इअ्मलू मा शिअ्तुम् इन्नहू बिमा तअ्मलू-न बसीर 
    जो लोग हमारी आयतों में हेर फेर पैदा करते हैं वह हरगिज़ हमसे पोशीदा नहीं हैं भला जो शख़्स दोज़ख़ में डाला जाएगा वह बेहतर है या वह शख़्स जो क़यामत के दिन बेख़ौफ व ख़तर आएगा (ख़ैर) जो चाहो सो करो (मगर) जो कुछ तुम करते हो वह (ख़़ुदा) उसको देख रहा है
  14. इन्नल्लज़ी-न क-फ़रू बिज़्ज़िक्रि लम्मा जा-अहुम् व इन्नहू ल-किताबुन् अ़ज़ीज़ 
    जिन लोगों ने नसीहत को जब वह उनके पास आयी न माना (वह अपना नतीजा देख लेंगे) और ये क़़ुरआन तो यक़ीनी एक आली मरतबा किताब है
  15. ला यअ्तीहिल्-बातिलु मिम्बैनि यदैहि व ला मिन् ख़ल्फ़िही तन्ज़ीलुम्-मिन् हकीमिन् हमीद 
    कि झूठ न तो उसके आगे फटक सकता है और न उसके पीछे से और खूबियों वाले दाना (ख़ुदा) की बारगाह से नाजि़ल हुयी है
  16. मा युक़ालु ल-क इल्ला मा क़द् क़ी-ल लिर्रुसुलि मिन् क़ब्लि-क, इन्-न रब्ब क लज़ू मग़्फ़ि रतिंव्-व ज़ू अिकाबिन् अलीम अलीम 
    (ऐ रसूल) तुमसे भी बस वही बातें कहीं जाती हैं जो तुमसे और रसूलों से कही जा चुकी हैं बेशक तुम्हारा परवरदिगार बख्शने वाला भी है और दर्दनाक अज़ाब वाला भी है
  17. व लौ जअ़ल्लाहु क़ुर्आनन् अअ्-जमिय्यल्-लक़ालू लौ ला फ़ुस्सिलत् आयातुहू अ-अअ्-जमिय्युंव-व अ़-रबिय्युन्, क़ुल् हु-व लिल्लज़ी-न आमनू हुदंव्-व शिफ़ाउन्, वल्लज़ी-न ला युअ्मिनू न फ़ी आज़ानिहिम् वक़्-रूंव व हु-व अ़लैहिम् अ़-मन्, उलाइ-क युनादौ न मिम्-मकानिम्-बईद
    और अगर हम इस क़ु़रआन को अरबी ज़बान के सिवा दूसरी ज़बान में नाजि़ल करते तो ये लोग ज़रूर कह न बैठते कि इसकी आयतें (हमारी) ज़बान में क्यों तफ़सीलदार बयान नहीं की गयी क्या (खू़ब क़़ुरान तो) अजमी और (मुख़ातिब) अरबी (ऐ रसूल) तुम कह दो कि इमानदारों के लिए तो ये (कु़रआन अज़सरतापा) हिदायत और (हर मर्ज़ की) शिफ़ा है और जो लोग ईमान नहीं रखते उनके कानों (के हक़) में गिरानी (बहरापन) है और वह (कु़रआन) उनके हक़ में नाबीनाई (का सबब) है तो गिरानी की वजह से गोया वह लोग बड़ी दूर की जगह से पुकारे जाते है
  18. व ल-क़द् आतैना मूसल्-किता-ब फ़ख़्तुलि-फ़ फ़ीहि, व लौ ला कलि-मतुन् स-बक़त् मिर्रब्बि-क लक़ुजि-य बैनहुम्, इन्नहुम् लफ़ी शक्किम् मिन्हु मुरीब
    (और नहीं सुनते) और हम ही ने मूसा को भी किताब (तौरैत) अता की थी तो उसमें भी इसमें एख़्तेलाफ किया गया और अगर तुम्हारे परवरदिगार की तरफ़ से एक बात पहले न हो चुकी होती तो उनमें कब का फैसला कर दिया गया होता, और ये लोग ऐसे शक में पड़े हुए हैं जिसने उन्हें बेचैन कर दिया है
  19. मन् अ़मि-ल सालिहन् फ़लि-नफ़्सिही व मन् असा-अ फ़ अ़लैहा, व मा रब्बु-क बिज़ल्लामिल्-लिल्- अ़बीद 
    जिसने अच्छे अच्छे काम किये तो अपने नफे़ के लिए और जो बुरा काम करे उसका बवाल भी उसी पर है और तुम्हारा परवरदिगार तो बन्दों पर (कभी) ज़ुल्म करने वाला नहीं
  20. इलैहि युरद्-दु अिल्मुस्सा-अ़ति व मा तख़्-रुजु मिन् स-मरातिम्-मिन् अक्मामिहा व मा तह्मिलु मिन् उन्सा व ला त-ज़अु इल्ला बिअिल्मिही, व यौ-म युनादीहिम् ऐ-न शु-रकाई क़ालू आज़न्ना-क मा मिन्ना मिन् शहीद
    क़यामत के इल्म का हवाला उसी की तरफ़ है (यानि वही जानता है) और बगै़र उसके इल्म व (इरादे) के न तो फल अपने पौरों से निकलते हैं और न किसी औरत को हमल रखता है और न वह बच्चा जनती है और जिस दिन (ख़़ुदा) उन (मुशरेकीन) को पुकारेगा और पूछेगा कि मेरे शरीक कहाँ हैं- वह कहेंगे हम तो तुझ से अर्ज़ कर चूके हैं कि हम में से कोई (उनसे) वाकिफ़ ही नहीं
  21. व ज़ल्-ल अ़न्हुम् मा कानू यद्अू -न मिन् क़ब्लु व ज़न्नू मा लहुम् मिम्-महीस 
    और इससे पहले जिन माबूदों की परसतिश करते थे वह ग़ायब हो गये और ये लोग समझ जाएगें कि उनके लिए अब मुख़लिसी नहीं
  22. ला यस्- अमुल् -इन्सानु मिन् दुआ़-इल्ख़ैरि व इम्-मस्सहुश्-शर्रू फ़-यऊसुन् क़नूत
    इन्सान भलाई की दुआए मांगने से तो कभी उकताता नहीं और अगर उसको कोई तकलीफ़ पहुँच जाए तो (फौरन) न उम्मीद और बेआस हो जाता है
  23. व ल-इन् अज़क़्नाहु रह्म-तम् मिन्ना मिम्-बअ्दि ज़र्रा-अ मस्सत्हु ल-यक़ूलन्-न हाज़ा ली व मा अज़ुन्नुस्सा-अ़-त क़ाइ-मतंव्-व ल-इर्-रुजिअ्तु इला रब्बी इन्-न ली अिन्दहू लल्हुस्ना फ़-लनुनब्बि-अन्नल्लज़ी- न क-फ़रू बिमा अ़मिलू व लनुज़ीक़न्नहुम् मिन् अ़ज़ाबिन् ग़लीज़ 
    और अगर उसको कोई तकलीफ़ पहुँच जाने के बाद हम उसको अपनी रहमत का मज़ा चखाएँ तो यक़ीनी कहने लगता है कि ये तो मेरे लिए ही है और मैं नहीं ख़याल करता कि कभी क़यामत बरपा होगी और अगर (क़यामत हो भी और) मैं अपने परवरदिगार की तरफ़ लौटाया भी जाऊँ तो भी मेरे लिए यक़ीनन उसके यहाँ भलाई ही तो है जो आमाल करते रहे हम उनको (क़यामत में) ज़रूर बता देंगें और उनको सख़्त अज़ाब का मज़ा चख़ाएगें
  24. व इज़ा अन्अ़म्ना अ़लल्-इन्सानि अअ्-र-ज़ व नआ बिजानिबिही व इज़ा मस्सहुश्शर्रू फ़ज़ू दुआ़इन् अ़रीज़ 
    (वह अलग) और जब हम इन्सान पर एहसान करते हैं तो (हमारी तरफ़ से) मुँह फेर लेता है और मुँह बदलकर चल देता है और जब उसे तकलीफ़ पहुँचती है तो लम्बी चैड़ी दुआएँ करने लगता है
  25. क़ुल् अ-रऐतुम् इन् का-न मिन् अिन्दिल्लाहि सुम्-म कफ़र्तुम् बिही मन् अज़ल्लु मिम्मन् हु-व फ़ी शिक़ाक़िम्-बईद 
    (ऐ रसूल) तुम कहो कि भला देखो तो सही कि अगर ये (क़़ुरआन) ख़ुदा की बारगाह से (आया) हो और फिर तुम उससे इन्कार करो तो जो (ऐसे) परले दर्जे की मुख़ालेफ़त में (पड़ा) हो उससे बढ़कर और कौन गुमराह हो सकता है
  26. सनुरीहिम् आयातिना फ़िल्-आफ़ाक़ि व फ़ी अन्फ़ुसिहिम् हत्ता य-तबय्य-न लहुम् अन्नहुल्-हक़्क़ु, अ-व लम् यक्फ़ि बिरब्बि-क अन्नहू अ़ला कुल्लि शैइन् शहीद 
    हम अनक़रीब ही अपनी (क़ु़दरत) की निशानियाँ अतराफ़ (आलम) में और ख़़ुद उनमें भी दिखा देगें यहाँ तक कि उन पर ज़ाहिर हो जाएगा कि वही यक़ीनन हक़ है क्या तुम्हारा परवरदिगार इसके लिए काफ़ी नहीं कि वह हर चीज़ पर क़ाबू रखता है
  27. अला इन्नहुम् फ़ी मिर्-यतिम्-मिल्लिक़ा-इ रब्बिहिम्, अला इन्नहू बिकुल्लि शैइम्-मुहीत *
    देखो ये लोग अपने परवरदिगार के रूबरू हाजि़र होने से शक में (पड़े) हैं सुन रखो वह हर चीज़ पर हावी है

Surah Fussilat | Surah ha mim as-Sajdah Video

Share this:

Leave a Comment

error: Content is protected !!