सूरा अल कहफ़ हिंदी में

सूरा अल कहफ़ हिंदी में (अनुवाद के साथ) Surah Al-Kahf in Hindi

सूरह कहफ कुरान की एक बड़ी अजमत और फ़जीलत वाली सूरह है। यह कुरान मजीद के पारा नंबर 15-16 में मौजूद 18वीं सूरह है। इसमें कुल 110 आयतें हैं। इस सूरह को ज्यादातर लोग जुम्मा के दिन पढ़ते हैं। जुम्मे की दिन इस सूरह को पढ़ने से इसकी फ़जीलत कई गुना बढ़ जाती है।

बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम

अल्लाह के नाम से जो रहमान व रहीम है

अल्हम्दु लिल्लाहिल्लज़ी अन्ज़ – ल अला अब्दिहिल – किता – ब व लम् यज्अ़ल – लहू अि – वजा (1)

हर तरह की तारीफ ख़ुदा ही को (सज़ावार) है जिसने अपने बन्दे (मोहम्मद) पर किताब (क़ुरान) नाज़िल की और उसमें किसी तरह की कज़ी (ख़राबी) न रखी (1)

क़य्यिमल् लियुन्ज़ि – र बअ्सन् शदीदम् – मिल्लदुन्हु व युबश्शिरल् मुअ्मिनीनल्लज़ी – न यअ्मलू नस्सालिहाति अन् – न लहुम् अज्रन् ह – सना (2)

बल्कि हर तरह से सधा ताकि जो सख्त अज़ाब ख़ुदा की बारगाह से काफिरों पर नाज़िल होने वाला है उससे लोगों को डराए और जिन मोमिनीन ने अच्छे अच्छे काम किए हैं उनको इस बात की खुशख़बरी दे की उनके लिए बहुत अच्छा अज्र (व सवाब) मौजूद है (2)

माकिसी – न फीहि अ – बदा (3)

जिसमें वह हमेशा (बाइत्मेनान) तमाम रहेगें (3)

व युन्जिरल्लज़ी – न कालुत्त – ख़ज़ल्लाहु व – लदा (4)

और जो लोग इसके क़ाएल हैं कि ख़ुदा औलाद रखता है उनको (अज़ाब से) डराओ (4)

मा लहुम् बिही मिन् अिल्मिंव् – व ला लि – आबाइहिम् , कबुरत् कलि – मतन् तख्रुजु मिन् अफ्वाहिहिम् , इंय्यकूलू – न इल्ला कज़िबा (5)

न तो उन्हीं को उसकी कुछ खबर है और न उनके बाप दादाओं ही को थी (ये) बड़ी सख्त बात है जो उनके मुँह से निकलती है ये लोग झूठ मूठ के सिवा (कुछ और) बोलते ही नहीं (5)

फ़ – लअ़ल्ल – क बाख़िअुन् – नफ़्स – क अ़ला आसारिहिम् इल्लम् युअ्मिनू बिहाज़ल – हदीसि अ – सफ़ा (6)

तो (ऐ रसूल) अगर ये लोग इस बात को न माने तो यायद तुम मारे अफसोस के उनके पीछे अपनी जान दे डालोगे (6)

इन्ना जअ़ल्ना मा अ़लल् – अर्ज़ि जी – नतल् – लहा लिनब्लु – वहुम् अय्युहुम् अह्सनु अ़ – मला (7)

और जो कुछ रुए ज़मीन पर है हमने उसकी ज़ीनत (रौनक़) क़रार दी ताकि हम लोगों का इम्तिहान लें कि उनमें से कौन सबसे अच्छा चलन का है (7)

व इन्ना लजाअ़िलू – न मा अ़लैहा सअ़ीदन् जुरूज़ा (8)

और (फिर) हम एक न एक दिन जो कुछ भी इस पर है (सबको मिटा करके) चटियल मैदान बना देगें (8)

अम् हसिब् – त अन् – न अस्हाबल् – कह्फ़ि वर्रकीमि कानू मिन् आयातिना अ़ – जबा (9)

(ऐ रसूल) क्या तुम ये ख्याल करते हो कि असहाब कहफ व रक़ीम (खोह) और (तख्ती वाले) हमारी (क़ुदरत की) निशानियों में से एक अजीब (निशानी) थे (9)

इज् अवल् – फ़ित्यतु इलल् – कह्फि फ़कालू रब्बना आतिना मिल्लदुन् – क रहम – तंव् – व हय्यिअ् लना मिन् अम्रिना र – शदा (10)

कि एक बारगी कुछ जवान ग़ार में आ पहुँचे और दुआ की-ऐ हमारे परवरदिगार हमें अपनी बारगाह से रहमत अता फरमा-और हमारे वास्ते हमारे काम में कामयाबी इनायत कर (10)

फ़ – ज़रब्ना अ़ला आज़ानिहिम् फ़िल् – कहफि सिनी – न अ़ – ददा (11)

तब हमने कई बरस तक ग़ार में उनके कानों पर पर्दे डाल दिए (उन्हें सुला दिया) (11)

सुम् – म बअ़स्नाहुम् लि – नअ्ल – म अय्युल् – हिज़्बैनि अह्सा लिमा लबिसू अ – मदा (12)*

फिर हमने उन्हें चौकाया ताकि हम देखें कि दो गिरोहों में से किसी को (ग़ार में) ठहरने की मुद्दत खूब याद है (12)

नह़्नु नकुस्सु अ़लै – क न – ब – अहुम् बिल्हक्कि , इन्नहुम् फ़ित्यतुन् आमनू बिरब्बिहिम् व ज़िद्नाहुम् हुदा (13)

(ऐ रसूल) अब हम उनका हाल तुमसे बिल्कुल ठीक तहक़ीक़ातन (यक़ीन के साथ) बयान करते हैं वह चन्द जवान थे कि अपने (सच्चे) परवरदिगार पर ईमान लाए थे और हम ने उनकी सोच समझ और ज्यादा कर दी है (13)

व रबत्ना अ़ला कुलूबिहिम् इज् कामू फ़क़ालू रब्बुना रब्बुस्समावाति वल्अर्ज़ि लन् – नद्अु – व मिन् दूनिही इलाहल् – ल क़द् कुल्ना इज़न् श – तता (14)

और हमने उनकी दिलों पर (सब्र व इस्तेक़लाल की) गिराह लगा दी (कि जब दक़ियानूस बादशाह ने कुफ्र पर मजबूर किया) तो उठ खड़े हुए (और बे ताम्मुल (खटके)) कहने लगे हमारा परवरदिगार तो बस सारे आसमान व ज़मीन का मालिक है हम तो उसके सिवा किसी माबूद की हरगिज़ इबादत न करेगें (14)

हाउला – इ कौमुनत्त – ख़जू मिन् दूनिही आलि – हतन् , लौ ला यअतू – न अ़लैहिम् बिसुल्तानिम् – बय्यिनिन् , फ़ – मन् अज़्लमु मिम् – मनिफ़्तरा अ़लल्लाहि कज़िबा (15)

अगर हम ऐसा करे तो यक़ीनन हमने अक़ल से दूर की बात कही (अफसोस एक) ये हमारी क़ौम के लोग हैं कि जिन्होनें ख़ुदा को छोड़कर (दूसरे) माबूद बनाए हैं (फिर) ये लोग उनके (माबूद होने) की कोई सरीही (खुली) दलील क्यों नहीं पेश करते और जो शख़्श ख़ुदा पर झूट बोहतान बाँधे उससे ज्यादा ज़ालिम और कौन होगा (15)

व इज़िअ् – तज़ल्तुमूहुम् व मा यअ्बुदू – न इल्लल्ला – ह फ़अ्वू इलल् – कह्फ़ि यन्शुर् लकुम् रब्बुकुम् मिर्रह़्मतिही व युहय्यिअ् लकुम् मिन् अम्रिकुम् मिर् फ़का (16)

(फिर बाहम कहने लगे कि) जब तुमने उन लोगों से और ख़ुदा के सिवा जिन माबूदों की ये लोग परसतिश करते हैं उनसे किनारा कशी करली तो चलो (फलॉ) ग़ार में जा बैठो और तुम्हारा परवरदिगार अपनी रहमत तुम पर वसीह कर देगा और तुम्हारा काम में तुम्हारे लिए आसानी के सामान मुहय्या करेगा (16)

व – तरश्शम् – स इज़ा त – लअ़त्तज़ा – वरू अ़न् कह्फ़िहिम् ज़ातल् – यमीनि व इज़ा ग़ – रबत् तक्रिजुहुम् जातश्शिमालि व हुम् फी फ़ज्वतिम् मिन्हु , ज़ालि – क मिन् आयातिल्लाहि , मंय्यह्दिल्लाहु फ़हुवल्मुह्तदि व मंय्युज्लिल फ़ – लन् तजि – द लहू वलिय्यम् – मुर्शिदा (17)*

(ग़रज़ ये ठान कर ग़ार में जा पहुँचे) कि जब सूरज निकलता है तो देखेगा कि वह उनके ग़ार से दाहिनी तरफ झुक कर निकलता है और जब ग़ुरुब (डुबता) होता है तो उनसे बायीं तरफ कतरा जाता है और वह लोग (मजे से) ग़ार के अन्दर एक वसीइ (बड़ी) जगह में (लेटे) हैं ये ख़ुदा (की कुदरत) की निशानियों में से (एक निशानी) है जिसको हिदायत करे वही हिदायत याफ्ता है और जिस को गुमराह करे तो फिर उसका कोई सरपरस्त रहनुमा हरगिज़ न पाओगे (17)

व तह्सबुहुम् ऐकाजंव् – व हुम् रूकूदुंव – व नुकल्लिबुहुम् जा़तल – यमीनि व जातश्शिमालि व कल्बुहुम् बासितुन् ज़िराअै़हि बिल् – वसीदि , लवित्त – लअ् – त अ़लैहिम् लवल्लै – त मिन्हुम् फ़िरारंव् – व लमुलिअ्- त मिन्हुम् रूअ्बा (18)

तू उनको समझेगा कि वह जागते हैं हालॉकि वह (गहरी नींद में) सो रहे हैं और हम कभी दाहिनी तरफ और कभी बायीं तरफ उनकी करवट बदलवा देते हैं और उनका कुत्ताा अपने आगे के दोनो पाँव फैलाए चौखट पर डटा बैठा है (उनकी ये हालत है कि) अगर कहीं तू उनको झाक कर देखे तो उलटे पाँव ज़रुर भाग खड़े हो और तेरे दिल में दहशत समा जाए (18)

व कज़ालि – क बअ़स्नाहुम् लि – य – तसाअलू बैनहुम् , का – ल का़इलुम् – मिन्हुम् कम् लबिस्तुम , कालू लबिस्ना यौमन् औ बअ् – ज़ यौमिन् , का़लू रब्बुकुम् अअ्लमु बिमा लबिसतुम् फ़ब्अ़सू अ – ह – दकुम् बिवरिकिकुम् हाज़िही इलल् – मदीनति फ़ल्यन्जुर् अय्युहा अज़्का तआमन् फल्यअ्तिकुम् बिरिज्किम् – मिन्हु वल्य – त • – लत्तफ् व ला युश्अ़िरन् – न बिकुम् अ – हदा (19)

और (जिस तरह अपनी कुदरत से उनको सुलाया) उसी तरह (अपनी कुदरत से) उनको (जगा) उठाया ताकि आपस में कुछ पूछ गछ करें (ग़रज़) उनमें एक बोलने वाला बोल उठा कि (भई आख़िर इस ग़ार में) तुम कितनी मुद्दत ठहरे कहने लगे (अरे ठहरे क्या बस) एक दिन से भी कम उसके बाद कहने लगे कि जितनी देर तुम ग़ार में ठहरे उसको तुम्हारे परवरदिगार ही (कुछ तुम से) बेहतर जानता है (अच्छा) तो अब अपने में से किसी को अपना ये रुपया देकर शहर की तरफ भेजो तो वह (जाकर) देखभाल ले कि वहाँ कौन सा खाना बहुत अच्छा है फिर उसमें से (ज़रुरत भर) खाना तुम्हारे वास्ते ले आए और उसे चाहिए कि वह आहिस्ता चुपके से आ जाए और किसी को तुम्हारी ख़बर न होने दे (19)

इन्नहुम् इंय्यज्हरू अ़लैकुम् यरजुमूकुम् औ युअ़ीदूकुम् फ़ी मिल्लतिहिम् व लन् तुफ़लिहू इज़न् अ – बदा (20)

इसमें शक़ नहीं कि अगर उन लोगों को तुम्हारी इत्तेलाअ हो गई तो बस फिर तुम को संगसार ही कर देंगें या फिर तुम को अपने दीन की तरफ फेर कर ले जाएँगे और अगर ऐसा हुआ तो फिर तुम कभी कामयाब न होगे (20)

व कज़ालि – क अअ्सरना अ़लैहिम् लि – यअ्लमू अन् – न वअ्दल्लाहि हक़्कुंव – व अन्नस्साअ़ – त ला रै – ब फ़ीहा , इज् य – तना – ज़अू – न बैनहुम् अम्रहुम् फ़क़ालुब्नू अलैहिम् बुन्यानन् , रब्बुहुम् अअ्लमु बिहिम् , कालल्लज़ी – न ग – लबू अ़ला अम्रिहिम् ल – नत्तख़िज़न् – न अ़लैहिम् मस्जिदा (21)

और हमने यूँ उनकी क़ौम के लोगों को उनकी हालत पर इत्तेलाअ (ख़बर) कराई ताकि वह लोग देख लें कि ख़ुदा को वायदा यक़ीनन सच्चा है और ये (भी समझ लें) कि क़यामत (के आने) में कुछ भी शुबहा नहीं अब (इत्तिलाआ होने के बाद) उनके बारे में लोग बाहम झगड़ने लगे तो कुछ लोगों ने कहा कि उनके (ग़ार) पर (बतौर यादगार) कोई इमारत बना दो उनका परवरदिगार तो उनके हाल से खूब वाक़िफ है ही और उनके बारे में जिन (मोमिनीन) की राए ग़ालिब रही उन्होंने कहा कि हम तो उन (के ग़ार) पर एक मस्जिद बनाएँगें (21)

स – यकूलू – न सला – सतुर् – राबिअुहुम् कल्बुहुम् व यकूलू – न ख़म्सतुन् सादिसुहुम् कल्बुहुम् रज्मम् – बिल्गै़बि व यकूलू – न सब्अ़तुंव – व सामिनुहुम् कल्बुहुम् , कुर्रब्बी अअ्लमु बिअिद्दतिहिम् मा यअ्लमुहुम् इल्ला क़लीलुन् , फ़ला तुमारि फ़ीहिम् इल्ला मिराअन् ज़ाहिरंव् – व ला तस्तफ्ति फ़ीहिम् मिन्हुम् अ – हदा (22)*

क़रीब है कि लोग (नुसैरे नज़रान) कहेगें कि वह तीन आदमी थे चौथा उनका कुत्ताा (क़तमीर) है और कुछ लोग (आक़िब वग़ैरह) कहते हैं कि वह पाँच आदमी थे छठा उनका कुत्ताा है (ये सब) ग़ैब में अटकल लगाते हैं और कुछ लोग कहते हैं कि सात आदमी हैं और आठवाँ उनका कुत्ताा है (ऐ रसूल) तुम कह दो की उनका सुमार मेरा परवरदिगार ही ख़ब जानता है उन (की गिनती) के थोडे ही लोग जानते हैं तो (ऐ रसूल) तुम (उन लोगों से) असहाब कहफ के बारे में सरसरी गुफ्तगू के सिवा (ज्यादा) न झगड़ों और उनके बारे में उन लोगों से किसी से कुछ पूछ गछ नहीं (22)

व ला तकूलन् – न लिशैइन् इन्नी फ़ाअिलुन् ज़ालि – क ग़दा (23)

और किसी काम की निस्बत न कहा करो कि मै इसको कल करुँगा (23)

इल्ला अंय्यशा – अल्लाहु , वज्कुर – रब्ब – क इज़ा नसी – त व कुल अ़सा अंय्यह्दि – यनि रब्बी लिअक्र – ब मिन् हाज़ा र – शदा (24)

मगर इन्शा अल्लाह कह कर और अगर (इन्शा अल्लाह कहना) भूल जाओ तो (जब याद आए) अपने परवरदिगार को याद कर लो (इन्शा अल्लाह कह लो) और कहो कि उम्मीद है कि मेरा परवरदिगार मुझे ऐसी बात की हिदायत फरमाए जो रहनुमाई में उससे भी ज्यादा क़रीब हो (24)

व लबिसू फ़ी कह्फ़िहिम् सला – स मि – अतिन् सिनी – न वज़्दादू तिस्आ़ (25)

और असहाब कहफ अपने ग़ार में नौ ऊपर तीन सौ बरस रहे (25)

कुलिल्लाहु अअ्लमु बिमा लबिसू लहू गै़बुस्समावाति वल्अर्जि अब्सिर् बिही व अस्मिअ् , मा लहुम् मिन् दूनिही मिंव्वलिय्यिंव – व ला युश्रिकु फ़ी हुक्मिही अ – हदा (26)

(ऐ रसूल) अगर वह लोग इस पर भी न मानें तो तुम कह दो कि ख़ुदा उनके ठहरने की मुद्दत से बखूबी वाक़िफ है सारे आसमान और ज़मीन का ग़ैब उसी के वास्ते ख़ास है (अल्लाह हो अकबर) वो कैसा देखने वाला क्या ही सुनने वाला है उसके सिवा उन लोगों का कोई सरपरस्त नहीं और वह अपने हुक्म में किसी को अपना दख़ील (शरीक) नहीं बनाता (26)

वत्लु मा ऊहि – य इलै – क मिन् किताबि रब्बि – क ला मुबद्दि – ल लि – कलिमातिही , व लन् तजि – द मिन् दुनिही मुल्त – हदा (27)

और (ऐ रसूल) जो किताब तुम्हारे परवरदिगार की तरफ से वही के ज़रिए से नाज़िल हुईहै उसको पढ़ा करो उसकी बातों को कोई बदल नहीं सकता और तुम उसके सिवा कहीं कोई हरगिज़ पनाह की जगह (भी) न पाओगे (27)

वस्बिर् नफ़्स – क मअ़ल्लज़ी – न यद्अू – न रब्बहुम् बिल्ग़दाति वल्अ़शिय्यि युरीदू – न वज्हहू व ला तअ्दु अै़ना – क अ़न्हुम तुरीदु ज़ी – नतल् – हयातिद्दुन्या व ला तुतिअ् मन् अग्फ़ल्ना क़ल्बहू अन् जिक्रिना वत्त – ब – अ हवाहु व का – न अम्रुहू फुरूता • (28)

और (ऐ रसूल) जो लोग अपने परवरदिगार को सुबह सवेरे और झटपट वक्त शाम को याद करते हैं और उसकी खुशनूदी के ख्वाहाँ हैं उनके उनके साथ तुम खुद (भी) अपने नफस पर जब्र करो और उनकी तरफ से अपनी नज़र (तवज्जो) न फेरो कि तुम दुनिया में ज़िन्दगी की आराइश चाहने लगो और जिसके दिल को हमने (गोया खुद) अपने ज़िक्र से ग़ाफिल कर दिया है और वह अपनी ख्वाहिशे नफसानी के पीछे पड़ा है और उसका काम सरासर ज्यादती है उसका कहना हरगिज़ न मानना (28)

व कुलिल् – हक़्कु मिर्रब्बिकुम् , फ़ – मन् शा – अ फ़ल्युअ्मिंव् – व मन् शा – अ फल्यक्फुर इन्ना अअ्तद्ना लिज़्जा़लिमी – न नारन् अहा – त बिहिम् सुरादिकुहा , व इंय्यस्तगी़सू युगा़सू बिमाइन् कल्मुह़्लि यश्विल् – वुजू – ह , बिअ्सश्शराबु , व साअत् मुर् – त – फका (29)

और (ऐ रसूल) तुम कह दों कि सच्ची बात (कलमए तौहीद) तुम्हारे परवरदिगार की तरफ से (नाज़िल हो चुकी है) बस जो चाहे माने और जो चाहे न माने (मगर) हमने ज़ालिमों के लिए वह आग (दहका के) तैयार कर रखी है जिसकी क़नातें उन्हें घेर लेगी और अगर वह लोग दोहाई करेगें तो उनकी फरियाद रसी खौलते हुए पानी से की जाएगी जो मसलन पिघले हुए ताबें की तरह होगा (और) वह मुँह को भून डालेगा क्या बुरा पानी है और (जहन्नुम भी) क्या बुरी जगह है (29)

इन्नल्लज़ी – न आमनू व अमिलुस्सालिहाति इन्ना ला नुज़ीअु अज् – र मन् अह्स – न अ – मला (30)

इसमें शक़ नहीं कि जिन लोगों ने ईमान कुबूल किया और अच्छे अच्छे काम करते रहे तो हम हरगिज़ अच्छे काम वालो के अज्र को अकारत नहीं करते (30)

उलाइ – क लहुम् जन्नातु अद्निन् तज्री मिन् तह्तिहिमुल – अन्हारू युहल्लौ – न फ़ीहा मिन् असावि – र मिन् ज़ – हबिंव् – व यल्बसू – न सियाबन् खु़ज्रम् – मिन् सुन्दुसिंव् – व इस्तब्रक़िम् – मुत्तकिई – न फ़ीहा अ़लल् अराइकि , निअ्मस्सवाबु , व हसुनत् मुर् – त – फ़क़ा (31)*

ये वही लोग हैं जिनके (रहने सहने के) लिए सदाबहार (बेहश्त के) बाग़ात हैं उनके (मकानात के) नीचे नहरें जारी होगीं वह उन बाग़ात में दमकते हुए कुन्दन के कंगन से सँवारे जाँएगें और उन्हें बारीक रेशम (क्रेब) और दबीज़ रेश्म (वाफते)के धानी जोड़े पहनाए जाएँगें और तख्तों पर तकिए लगाए (बैठे) होगें क्या ही अच्छा बदला है और (बेहश्त भी आसाइश की) कैसी अच्छी जगह है (31)

वज्रिब् लहुम् म – सलर् – रजुलैनि जअ़ल्ना लि – अ – हदिहिमा जन्नतैनि मिन् अअ्नाबिंव् – व हफ़फ़्नाहुमा बिनख्लिंव् – व जअ़ल्ना बैनहुमा ज़रआ (32)

और (ऐ रसूल) इन लोगों से उन दो शख़्शों की मिसाल बयान करो कि उनमें से एक को हमने अंगूर के दो बाग़ दे रखे है और हमने चारो ओर खजूर के पेड़ लगा दिये है और उन दोनों बाग़ के दरमियान खेती भी लगाई है (32)

किल्तल् – जन्नतैनि आतत् उकु – लहा व लम् तज्लिम् मिन्हु शैअंव् – व फ़ज्जरना ख़िला – लहुमा न – हरा (33)

वह दोनों बाग़ खूब फल लाए और फल लाने में कुछ कमी नहीं की और हमने उन दोनों बाग़ों के दरमियान नहर भी जारी कर दी है (33)

व का – न लहू स – मरून् फ़का – ल लिसाहिबिही व हु – व युहाविरूहू अ – न अक्सरू मिन् – क मालंव् – व अ – अ़ज़्जु़ न – फ़रा (34)

और उसे फल मिला तो अपने साथी से जो उससे बातें कर रहा था बोल उठा कि मै तो तुझसे माल में (भी) ज्यादा हूँ और जत्थे में भी बढ़ कर हूँ (34)

व द – ख़ – ल जन्नतहू व हु – व ज़ालिमुल लिनफ्सिही का – ल मा अजुन्नु अन् तबी – द हाज़िही अ – बदा (35)

और ये बातें करता हुआ अपने बाग़ मे भी जा पहुँचा हालॉकि उसकी आदत ये थी कि (कुफ्र की वजह से) अपने ऊपर आप ज़ुल्म कर रहा था (ग़रज़ वह कह बैठा) कि मुझे तो इसका गुमान नहीं तो कि कभी भी ये बाग़ उजड़ जाए (35)

व मा अजुन्नुस्सा – अ – त काइ – मतंव् – व ल – इर्रूदित्तु इला रब्बी ल – अजिदन् – न खै़रम् – मिन्हा मुन्क़ – लबा (36)

और मै तो ये भी नहीं ख्याल करता कि क़यामत क़ायम होगी और (बिलग़रज़ हुई भी तो) जब मै अपने परवरदिगार की तरफ लौटाया जाऊँगा तो यक़ीनन इससे कहीं अच्छी जगह पाऊँगा (36)

का़ – ल लहू साहिबुहू व हु – व युहाविरूहू अ – कफ़र् – त बिल्लज़ी ख़ – ल – क – क मिन् तुराबिन सुम् – म मिन् नुत्फ़तिन् सुम् – म सव्वा – क रजुला (37)

उसका साथी जो उससे बातें कर रहा था कहने लगा कि क्या तू उस परवरदिगार का मुन्किर है जिसने (पहले) तुझे मिट्टी से पैदा किया फिर नुत्फे से फिर तुझे बिल्कुल ठीक मर्द (आदमी) बना दिया (37)

लाकिन् – न हुवल्लाहु रब्बी व ला उशरिकु बिरब्बी अ – हदा (38)

हम तो (कहते हैं कि) वही ख़ुदा मेरा परवरदिगार है और मै तो अपने परवरदिगार का किसी को शरीक नहीं बनाता (38)

व लौ ला इज् दख़ल् – त जन्न – त – क कुल् – त मा शा – अल्लाहु ला कुव्व – त इल्ला बिल्लाहि इन् तरनि अ – न अक़ल् – ल मिन् – क मालंव् – व व – लदा (39)

और जब तू अपने बाग़ में आया तो (ये) क्यों न कहा कि ये सब (माशा अल्लाह ख़ुदा ही के चाहने से हुआ है (मेरा कुछ भी नहीं क्योंकि) बग़ैर ख़ुदा की (मदद) के (किसी में) कुछ सकत नहीं अगर माल और औलाद की राह से तू मुझे कम समझता है (39)

फ़ – अ़सा रब्बी अंय्युअ्ति – यनि खै़रम् – मिन् जन्नति – क व युरसि – ल अ़लैहा हुस्बानम् – मिनस्समा – इ फतुस्बि – ह सअ़ीदन् ज़ – लका (40)

औ युस्बि – ह माउहा गौ़रन् फ़ – लन् तस्तती – अ़ लहू त – लबा (41)

उसका पानी नीचे उतर (के खुश्क) हो जाए फिर तो उसको किसी तरह तलब न कर सके (41)

व उही – त बि – स – मरिही फ़ – अस्ब – ह युक़ल्लिबु कफ़्फै़हि अ़ला मा अन्फ़ – क़ फ़ीहा व हि – य ख़ावि – यतुन् अ़ला अुरूशिहा व यकूलु यालैतनी लम् उशिरक् बिरब्बी अ – हदा (42)

(चुनान्चे अज़ाब नाज़िल हुआ) और उसके (बाग़ के) फल (आफत में) घेर लिए गए तो उस माल पर जो बाग़ की तैयारी में सर्फ (ख़र्च) किया था (अफसोस से) हाथ मलने लगा और बाग़ की ये हालत थी कि अपनी टहनियों पर औंधा गिरा हुआ पड़ा था तो कहने लगा काश मै अपने परवरदिगार का किसी को शरीक न बनाता (42)

व लम् तकुल्लहू फ़ि – अतुंय्यन्सुरूनहू मिन् दूनिल्लाहि व मा का – न मुन्तसिरा (43)

और ख़ुदा के सिवा उसका कोई जत्था भी न था कि उसकी मदद करता और न वह बदला ले सकता था इसी जगह से (साबित हो गया (43)

हुना लिकल् – व ला – यतु लिल्लाहिल् – हक्कि , हु – व खै़रून् सवाबंव् – व खै़रून् अुक्बा (44)*

कि सरपरस्ती ख़ास ख़ुदा ही के लिए है जो सच्चा है वही बेहतर सवाब (देने) वाला है और अन्जाम के जंगल से भी वही बेहतर है (44)

वज्रिब् लहुम् म – सलल् – हयातिद्दुन्या कमाइन् अन्ज़ल्नाहु मिनस्समा – इ फ़ख़्त – ल – त बिही नबातुल्अर्ज़ि फ़अस्ब – ह हशीमन् तज्रूहुर्रियाहु , व कानल्लाहु अ़ला ” कुल्लि शैइम् – मुक्तदिरा (45)

और (ऐ रसूल) इनसे दुनिया की ज़िन्दगी की मसल भी बयान कर दो कि उसके हालत पानी की सी है जिसे हमने आसमान से बरसाया तो ज़मीन की उगाने की ताक़त उसमें मिल गई और (खूब फली फूली) फिर आख़िर रेज़ा रेज़ा (भूसा) हो गई कि उसको हवाएँ उड़ाए फिरती है और ख़ुदा हर चीज़ पर क़ादिर है (45)

अल्मालु वल्बनू – न जीनतुल – हयातिद्दुन्या वल्बाकियातुस्सालिहातु खैरून् अिन् – द रब्बि – क सवाबंव् – व खैरून् अ – मला (46)

(ऐ रसूल) माल और औलाद (इस ज़रा सी) दुनिया की ज़िन्दगी की ज़ीनत हैं और बाक़ी रहने वाली नेकियाँ तुम्हारे परवरदिगार के नज़दीक सवाब में उससे कही ज्यादा अच्छी हैं और तमन्नाएँ व आरजू की राह से (भी) बेहतर हैं (46)

व यौ – म नुसय्यिरूल् – जिबा – ल व तरल् – अर् – ज़ बारि – ज़तंव् – व हशरनाहुम् फ़ – लम् नुग़ादिर् मिन्हुम् अ – हदा (47)

और (उस दिन से डरो) जिस दिन हम पहाड़ों को चलाएँगें और तुम ज़मीन को खुला मैदान (पहाड़ों से) खाली देखोगे और हम इन सभी को इकट्ठा करेगे तो उनमें से एक को न छोड़ेगें (47)

व अुरिजू अला रब्बि – क सफ़्फ़न् , ल – क़द् जिअ्तुमूना कमा ख़लक़्नाकुम् अव्व – ल मर्रतिम् बल् ज़अ़म्तुम् अल् – लन् नज् – अ़ – ल लकुम् मौअिदा (48)

सबके सब तुम्हारे परवरदिगार के सामने कतार पे क़तार पेश किए जाएँगें और (उस वक्त हम याद दिलाएँगे कि जिस तरह हमने तुमको पहली बार पैदा किया था (उसी तरह) तुम लोगों को (आख़िर) हमारे पास आना पड़ा मगर तुम तो ये ख्याल करते थे कि हम तुम्हारे (दोबारा पैदा करने के) लिए कोई वक्त ही न ठहराएँगें (48)

व वुज़िअ़ल् – किताबु फ़ – तरल् – मुज्रिमी – न मुश्फिकी – न मिम्मा फीहि व यकूलू – न यावैल – तना मा लि – हाज़ल – किताबि ला युग़ादिरू सगी़ – रतंव् – व ला कबी – रतन् इल्ला अह्साहा व व – जदू मा अ़मिलू हाज़िरन् , व ला यज्लिमु रब्बु – क अ – हदा (49)*

और लोगों के आमाल की किताब (सामने) रखी जाएँगी तो तुम गुनेहगारों को देखोगे कि जो कुछ उसमें (लिखा) है (देख देख कर) सहमे हुए हैं और कहते जाते हैं हाए हमारी यामत ये कैसी किताब है कि न छोटे ही गुनाह को बे क़लमबन्द किए छोड़ती है न बड़े गुनाह को और जो कुछ इन लोगों ने (दुनिया में) किया था वह सब (लिखा हुआ) मौजूद पाएँगें और तेरा परवरदिगार किसी पर (ज़र्रा बराबर) ज़ुल्म न करेगा (49)

व इज् कुल्ना लिल्मलाइ – कतिस्जुदू लिआद – म फ़ – स – जदू इल्ला इब्ली – स , का – न मिनल् – जिन्नि फ़ – फ़ – स – क अन् अम्रि रब्बिही , अ – फ़ – तत्तखिजूनहू व जुर्रिय्य – तहू औलिया – अ मिन् दूनी व हुम् लकुम् अ़दुव्वुन् , बिअ् – स लिज़्जा़लिमी – न ब – दला (50)

और (वह वक्त याद करो) जब हमने फ़रिश्तों को हुक्म दिया कि आदम को सजदा करो तो इबलीस के सिवा सबने सजदा किया (ये इबलीस) जिन्नात से था तो अपने परवरदिगार के हुक्म से निकल भागा तो (लोगों) क्या मुझे छोड़कर उसको और उसकी औलाद को अपना दोस्त बनाते हो हालॉकि वह तुम्हारा (क़दीमी) दुश्मन हैं ज़ालिमों (ने ख़ुदा के बदले शैतान को अपना दोस्त बनाया ये उन) का क्या बुरा ऐवज़ है (50)

मा अश्हत्तुहुम् ख़ल्कस् – समावाति वल्अर्जि व ला ख़ल् – क अन्फुसिहिम् व मा कुन्तु मुत्तख़िज़ल् – मुज़िल्ली – न अ़जुदा (51)

मैने न तो आसमान व ज़मीन के पैदा करने के वक्त उनको (मदद के लिए) बुलाया था और न खुद उनके पैदा करने के वक्त अौर मै (ऐसा गया गुज़रा) न था कि मै गुमराह करने वालों को मददगार बनाता (51)

व यौ – म यकूलु नादू शु – रकाइ – यल्लजी – न ज़अ़म्तुम् फ़ – दऔ़हुम् फ़ – लम् यस्तजीबू लहुम् व जअ़ल्ना बैनहुम् मौबिका (52)

और (उस दिन से डरो) जिस दिन ख़ुदा फरमाएगा कि अब तुम जिन लोगों को मेरा शरीक़ ख्याल करते थे उनको (मदद के लिए) पुकारो तो वह लोग उनको पुकारेगें मगर वह लोग उनकी कुछ न सुनेगें और हम उन दोनों के बीच में महलक (खतरनाक) आड़ बना देंगे (52)

व र – अल् मुज्रिमूनन्ना – र फ़ – ज़न्नू अन्नहुम् मुवाकिअूहा व लम् यजिदू अन्हा मस्रिफ़ा (53)*

और गुनेहगार लोग (देखकर समझ जाएँगें कि ये इसमें सोके जाएँगे और उससे गरीज़ (बचने की) की राह न पाएँगें (53)

व ल – कद् सर्रफ्ना फ़ी हाज़ल् – कुरआनि लिन्नासि मिन् कुल्लि म – सलिन् , व कानल् – इन्सानु अक्स – र शैइन् ज – दला (54)

और हमने तो इस क़ुरान में लोगों (के समझाने) के वास्ते हर तरह की मिसालें फेर बदल कर बयान कर दी है मगर इन्सान तो तमाम मख़लूक़ात से ज्यादा झगड़ालू है (54)

व मा म – नअ़न् – ना – स अंय्युअ्मिनू इज् जाअहुमुल्हुदा व यस्तग्फिरू रब्बहुम् इल्ला अन् तअ्ति – यहुम् सुन्नतुल – अव्वली – न औ यअ्ति – यहुमुल – अ़ज़ाबु कुबुला (55)

और जब लोगों के पास हिदायत आ चुकी तो (फिर) उनको ईमान लाने और अपने परवरदिगार से मग़फिरत की दुआ माँगने से (उसके सिवा और कौन) अम्र मायने है कि अगलों की सी रीत रस्म उनको भी पेश आई या हमारा अज़ाब उनके सामने से (मौजूद) हो (55)

व मा नुर्सिलुल् – मुर्सली – न इल्ला मुबश्शिरी – न व मुन्ज़िरी – न व युजादिलुल्लज़ी – न क – फरू बिल्बातिलि लियुद्हिजू बिहिल्हक् – क वत्त – ख़जू आयाती व मा उन्ज़िरू हुजुवा (56)

और हम तो पैग़म्बरों को सिर्फ इसलिए भेजते हैं कि (अच्छों को निजात की) खुशख़बरी सुनाएंऔर (बदों को अज़ाब से) डराएंऔर जो लोग काफिर हैं झूटी झूटी बातों का सहारा पकड़ के झगड़ा करते है ताकि उसकी बदौलत हक़ को (उसकी जगह से उखाड़ फेकें और उन लोगों ने मेरी आयतों को जिस (अज़ाब से) ये लोग डराए गए हॅसी ठ्ठ्ठा (मज़ाक) बना रखा है (56)

व मन् अज़्लमु मिम् – मन् जुक्कि – र बिआयाति रब्बिही फ़ – अअ्र – ज़ अन्हा व नसि – य मा क़द्दमत् यदाहु , इन्ना जअ़ल्ना अ़ला कुलूबिहिम् अकिन्न – तन् अंय्यफ़्क़हूहु व फी आज़ानिहिम् वक्रन् , व इन् तद्अुहुम् इलल् – हुदा फ़ – लंय्यह्तदू इज़न् अ – बदा (57)

और उससे बढ़कर और कौन ज़ालिम होगा जिसको ख़ुदा की आयतें याद दिलाई जाए और वह उनसे रद गिरदानी (मुँह फेर ले) करे और अपने पहले करतूतों को जो उसके हाथों ने किए हैं भूल बैठे (गोया) हमने खुद उनके दिलों पर परदे डाल दिए हैं कि वह (हक़ बात को) न समझ सकें और (गोया) उनके कानों में गिरानी पैदा कर दी है कि (सुन न सकें) और अगर तुम उनको राहे रास्त की तरफ़ बुलाओ भी तो ये हरगिज़ कभी रुबरु होने वाले नहीं हैं (57)

व रब्बुकल – ग़फूरू जुर्रह्मति , लौ युआखिजुहुम् बिमा क – सबू ल – अ़ज्ज – ल लहुमुल् – अज़ा – ब , बल् – लहुम् मौअिदुल् – लंय्यजिदू मिन् दूनिही मौअिला (58)

और (ऐ रसूल) तुम्हारा परवरदिगार तो बड़ा बख्शने वाला मेहरबान है अगर उनकी करतूतों की सज़ा में धर पकड़ करता तो फौरन (दुनिया ही में) उन पर अज़ाब नाज़िल कर देता मगर उनके लिए तो एक मियाद (मुक़र्रर) है जिससे खुदा के सिवा कहीें पनाह की जगह न पाएंगें (58)

व तिल्कल् – कुरा अह़्लक्नाहुम् लम्मा ज़ – लमू व जअ़ल्ना लिमह़्लिकिहिम् मौअिदा (59)*

और ये बस्तियाँ (जिन्हें तुम अपनी ऑंखों से देखते हो) जब उन लोगों ने सरकशी तो हमने उन्हें हलाक कर मारा और हमने उनकी हलाकत की मियाद मुक़र्रर कर दी थी (59)

व इज् का – ल मूसा लि – फ़ताहु ला अब्रहु हत्ता अब्लु – ग़ मज्म – अ़ल् बहरैनि औ अम्ज़ि – य हुकुबा (60)

(ऐ रसूल) वह वाक़या याद करो जब मूसा खिज़्र की मुलाक़ात को चले तो अपने जवान वसी यूशा से बोले कि जब तक में दोनों दरियाओं के मिलने की जगह न पहुँच जाऊँ (चलने से) बाज़ न आऊँगा (60)

फ़ – लम्मा ब – लगा़ मज्म – अ़ बैनिहिमा नसिया हूतहुमा फत्त – ख – ज़ सबीलहू फ़िल्बहरि स – रबा (61)

ख्वाह (अगर मुलाक़ात न हो तो) बरसों यूँ ही चलता जाऊँगा फिर जब ये दोनों उन दोनों दरियाओं के मिलने की जगह पहुँचे तो अपनी (भुनी हुई) मछली छोड़ चले तो उसने दरिया में सुरंग बनाकर अपनी राह ली (61)

फ़ – लम्मा जा – वज़ा का – ल लि – फ़ताहु आतिना ग़दा – अना , ल – क़द् लकी़ना मिन् स – फ़रिना हाज़ा न – सबा (62)

फिर जब कुछ और आगे बढ़ गए तो मूसा ने अपने जवान (वसी) से कहा (अजी हमारा नाश्ता तो हमें दे दो हमारे (आज के) इस सफर से तो हमको बड़ी थकन हो गई (62)

का – ल अ – रऐ – त इज् अवैना इलस्सख़्रति फ़ – इन्नी नसीतुल – हू – त वमा अन्सानीहु इल्लश्शैतानु अन् अज़्कु – रहु वत्त – ख़ – ज़ सबी – लहू फ़िल्बहरि अ़ – जबा (63)

(यूशा ने) कहा क्या आप ने देखा भी कि जब हम लोग (दरिया के किनारे) उस पत्थर के पास ठहरे तो मै (उसी जगह) मछली छोड़ आया और मुझे आप से उसका ज़िक्र करना शैतान ने भुला दिया और मछली ने अजीब तरह से दरिया में अपनी राह ली (63)

का – ल ज़ालि – क मा कुन्ना नब्गि फ़रतद्दा अ़ला आसारिहिमा क़ – ससा (64)

मूसा ने कहा वही तो वह (जगह) है जिसकी हम जुस्तजू (तलाश) में थे फिर दोनों अपने क़दम के निशानों पर देखते देखते उलटे पॉव फिरे (64)

फ़ – व – जदा अब्दम् – मिन् अिबादिना आतैनाहु रह़्म – तम् मिन् अिन्दिना व अ़ल्लम्नाहु मिल्लदुन्ना अिल्मा (65)

तो (जहाँ मछली थी) दोनों ने हमारे बन्दों में से एक (ख़ास) बन्दा खिज्र को पाया जिसको हमने अपनी बारगाह से रहमत (विलायत) का हिस्सा अता किया था (65)

का – ल लहू मूसा हल अत्तबिअु – क अ़ला अन् तुअ़ल्लि – मनि मिम्मा अुल्लिम् – त रूश्दा (66)

और हमने उसे इल्म लदुन्नी (अपने ख़ास इल्म) में से कुछ सिखाया था मूसा ने उन (ख़िज्र) से कहा क्या (आपकी इजाज़त है कि) मै इस ग़रज़ से आपके साथ साथ रहूँ (66)

का़ – ल इन्न – क लन् तस्तती – अ़ मअि – य सब्रा (67)

कि जो रहनुमाई का इल्म आपको है (ख़ुदा की तरफ से) सिखाया गया है उसमें से कुछ मुझे भी सिखा दीजिए खिज्र ने कहा (मै सिखा दूँगा मगर) आपसे मेरे साथ सब्र न हो सकेगा (67)

व कै – फ़ तस्बिरू अला मा लम् तुह्ति बिही खुब्रा (68)

और (सच तो ये है) जो चीज़ आपके इल्मी अहाते से बाहर हो (68)

का – ल स – तजिदुनी इन्शा – अल्लाहु साबिरंव् – व ला अअ्सी ल – क अम्रा (69)

उस पर आप सब्र क्योंकर कर सकते हैं मूसा ने कहा (आप इत्मिनान रखिए) अगर ख़ुदा ने चाहा तो आप मुझे साबिर आदमी पाएँगें (69)

का – ल फ़ – इनित्त – बअ्तनी फ़ला तसअल्नी अ़न् शैइन् हत्ता उह्दि – स ल – क मिन्हु ज़िक्रा (70)*

और मै आपके किसी हुक्म की नाफरमानी न करुँगा खिज्र ने कहा अच्छा तो अगर आप को मेरे साथ रहना है तो जब तक मै खुद आपसे किसी बात का ज़िक्र न छेडँ (70)

फन्त – लका , हत्ता इज़ा रकिबा फ़िस्सफ़ी – नति ख – र – कहा , का – ल अ – ख़रक्तहा लितुग्रि – क़ अह़्लहा ल – क़द् जिअ् – त शैअन् इम्रा (71)

आप मुझसे किसी चीज़ के बारे में न पूछियेगा ग़रज़ ये दोनो (मिलकर) चल खड़े हुए यहाँ तक कि (एक दरिया में) जब दोनों कश्ती में सवार हुए तो ख़िज्र ने कश्ती में छेद कर दिया मूसा ने कहा (आप ने तो ग़ज़ब कर दिया) क्या कश्ती में इस ग़रज़ से सुराख़ किया है (71)

का – ल अलम् अकुल इन्न – क लन् तस्तती – अ़ मअि – य सब्रा (72)

कि लोगों को डुबा दीजिए ये तो आप ने बड़ी अजीब बात की है-ख़िज्र ने कहा क्या मैने आप से (पहले ही) न कह दिया था (72)

क़ा – ल ला तुआख़िज़्नी बिमा नसीतु वला तुरहिक्नी मिन् अम्री अु़सरा (73)

कि आप मेरे साथ हरगिज़ सब्र न कर सकेगे-मूसा ने कहा अच्छा जो हुआ सो हुआ आप मेरी गिरफत न कीजिए और मुझ पर मेरे इस मामले में इतनी सख्ती न कीजिए (73)

फ़न्त – लका , हत्ता इज़ा लक़िया गुलामन् फ़ – क – त – लहू का़ – ल अ – क़तल् – त नफ़्सन् ज़किय्य – तम् बिगै़रि नफ़्सिन् , ल – क़द् जिअ् – त शैअन् नुकरा (74)

(ख़ैर ये तो हो गया) फिर दोनों के दोनों आगे चले यहाँ तक कि दोनों एक लड़के से मिले तो उस बन्दे ख़ुदा ने उसे जान से मार डाला मूसा ने कहा (ऐ माज़ अल्लाह) क्या आपने एक मासूम शख़्श को मार डाला और वह भी किसी के (ख़ौफ के) बदले में नहीं आपने तो यक़ीनी एक अजीब हरकत की (74)

का – ल अलम् अकुल् – ल – क इन्न – क लन् तस्तती – अ़ मअि – य सब्रा (75)

खिज्र ने कहा कि मैंने आपसे (मुक़र्रर) न कह दिया था कि आप मेरे साथ हरगिज़ नहीं सब्र कर सकेगें (75)

का – ल इन् सअल्तु – क अ़न् शैइम् बअ् – दहा फ़ला तुसाहिब्नी क़द् बलग् – त मिल्लदुन्नी अुज्रा (76)

मूसा ने कहा (ख़ैर जो हुआ वह हुआ) अब अगर मैं आप से किसी चीज़ के बारे में पूछगछ करूँगा तो आप मुझे अपने साथ न रखियेगा बेशक आप मेरी तरफ से माज़रत (की हद को) पहुँच गए (76)

फ़न्त – लका़ , हत्ता इज़ा अ – तया अह् – ल कर् – यति – निस्तत् – अ़मा अह़्लहा फ़ – अबौ अंय्युज़य्यिफूहुमा फ़ – व – जदा फ़ीहा जिदारंय्युरीदु अंय्यन्कज् – ज़ फ़ – अकामहू , का – ल लौ शिअ् – त लत्त – खज् – त अ़लैहि अज्रा (77)

ग़रज़ (ये सब हो हुआ कर फिर) दोनों आगे चले यहाँ तक कि जब एक गाँव वालों के पास पहुँचे तो वहाँ के लोगों से कुछ खाने को माँगा तो उन लोगों ने दोनों को मेहमान बनाने से इन्कार कर दिया फिर उन दोनों ने उसी गाँव में एक दीवार को देखा कि गिरा ही चाहती थी तो खिज्र ने उसे सीधा खड़ा कर दिया उस पर मूसा ने कहा अगर आप चाहते तो (इन लोगों से) इसकी मज़दूरी ले सकते थे (77)

का – ल हाज़ा फ़िराकु बैनी व बैनि – क स – उनब्बिउ – क बितअ्वीलि मा लम् तस्ततिअ् अ़लैहि सब्रा (78)

(ताकि खाने का सहारा होता) खिज्र ने कहा मेरे और आपके दरमियान छुट्टम छुट्टा अब जिन बातों पर आप से सब्र न हो सका मैं अभी आप को उनकी असल हक़ीकत बताए देता हूँ (78)

अम्मस्सफी – नतु फ़ – कानत् लि – मसाकी – न यअ्मलू – न फ़िल्बहरि फ़ – अरत्तु अन् अअी़ – बहा व का – न वरा – अहुम् मलिकुंय्यअ्खुजु कुल – ल सफी़ – नतिन् ग़स्बा (79)

(लीजिए सुनिये) वह कश्ती (जिसमें मैंने सुराख़ कर दिया था) तो चन्द ग़रीबों की थी जो दरिया में मेहनत करके गुज़ारा करते थे मैंने चाहा कि उसे ऐबदार बना दूँ (क्योंकि) उनके पीछे-पीछे एक (ज़ालिम) बादशाह (आता) था कि तमाम कश्तियां ज़बरदस्ती बेगार में पकड़ लेता था (79)

व अम्मल् – गुलामु फ़का – न अ – बवाहु मुअ्मिनैनि फ़ – ख़शीना अंय्युरहि – क़हुमा तुग्यानंव् – व कुफ्रा (80)

और वह जो लड़का जिसको मैंने मार डाला तो उसके माँ बाप दोनों (सच्चे) ईमानदार हैं तो मुझको ये अन्देशा हुआ कि (ऐसा न हो कि बड़ा होकर) उनको भी अपने सरकशी और कुफ़्र में फँसा दे (80)

फ़ – अरद्ना अंय्युब्दि लहुमा रब्बुहुमा खै़रम् – मिन्हु ज़कातंव् – व अक्र – ब रूहमा (81)

तो हमने चाहा कि (हम उसको मार डाले और) उनका परवरदिगार इसके बदले में ऐसा फरज़न्द अता फरमाए जो उससे पाक नफ़सी और पाक कराबत में बेहतर हो (81)

व अम्मल् – जिदारू फ़का – न लिगुलामैनि यतीमैनि फिल् – मदीनति व का – न तह्तहू कन्जुल् – लहुमा व का – न अबूहुमा सालिहन् फ़ – अरा – द रब्बु – क अंय्यब्लुगा अशुद्दहुमा व यस्तख्रिजा कन्ज़हुमा रहमतम् मिर्रब्बि – क व मा फ़अ़ल्तुहू अ़न् अम्री , ज़ालि – क तअ्वीलु मा लम् तस्तिअ् अ़लैहि सब्रा (82)*

और वह जो दीवार थी (जिसे मैंने खड़ा कर दिया) तो वह शहर के दो यतीम लड़कों की थी और उसके नीचे उन्हीं दोनों लड़कों का ख़ज़ाना (गड़ा हुआ था) और उन लड़कों का बाप एक नेक आदमी था तो तुम्हारे परवरदिगार ने चाहा कि दोनों लड़के अपनी जवानी को पहुँचे तो तुम्हारे परवरदिगार की मेहरबानी से अपना ख़ज़ाने निकाल ले और मैंने (जो कुछ किया) कुछ अपने एख्तियार से नहीं किया (बल्कि खुदा के हुक्म से) ये हक़ीक़त है उन वाक़यात की जिन पर आपसे सब्र न हो सका (82)

व यस्अलून – क अ़न् ज़िल्क़रनैनि , कुल स – अत्लू अ़लैकुम् मिन्हु ज़िक्रा (83)

और (ऐ रसूल) तुमसे लोग ज़ुलक़रनैन का हाल (इम्तेहान) पूछा करते हैं तुम उनके जवाब में कह दो कि मैं भी तुम्हें उसका कुछ हाल बता देता हूँ (83)

इन्ना मक्कन्ना लहू फ़िल्अर्जि व आतैनाहु मिन् कुल्लि शैइन् स – बबा (84)

(ख़ुदा फरमाता है कि) बेशक हमने उनको ज़मीन पर कुदरतें हुकूमत अता की थी और हमने उसे हर चीज़ के साज़ व सामान दे रखे थे (84)

फ़ – अत्ब – अ़ स – बबा (85)

वह एक सामान (सफर के) पीछे पड़ा (85)

हत्ता इज़ा ब – ल – ग़ मग्रिबश्शम्सि व – ज – दहा तग़्रुबु फ़ी अै़निन् हमि – अतिंव् – व व – ज – द अि़न्दहा क़ौमन् , कुल्ना या ज़ल्करनैनि इम्मा अन् तुअ़ज़्ज़ि – ब व इम्मा अन् तत्तखि – ज़ फ़ीहिम् हुस्ना (86)

यहाँ तक कि जब (चलते-चलते) आफताब के ग़ुरूब होने की जगह पहुँचा तो आफताब उनको ऐसा दिखाई दिया कि (गोया) वह काली कीचड़ के चश्में में डूब रहा है और उसी चश्में के क़रीब एक क़ौम को भी आबाद पाया हमने कहा ऐ जुलकरनैन (तुमको एख्तियार है) ख्वाह इनके कुफ्र की वजह से इनकी सज़ा करो (कि ईमान लाए) या इनके साथ हुस्ने सुलूक का शेवा एख्तियार करो (कि खुद ईमान क़ुबूल करें) (86)

का – ल अम्मा मन् ज़ – ल – म फ़सौ – फ़ नुअ़ज्जिबुहू सुम् – म युरद्दु इला रब्बिही फ़युअ़ज़्ज़िबुहू अ़ज़ाबन् नुक्रा (87)

जुलकरनैन ने अर्ज़ की जो शख्स सरकशी करेगा तो हम उसकी फौरन सज़ा कर देगें (आख़िर) फिर वह (क़यामत में) अपने परवरदिगार के सामने लौटाकर लाया ही जाएगा और वह बुरी से बुरी सज़ा देगा (87)

व अम्मा मन् आम – न व अ़मि – ल सालिहन् फ़ – लहू जज़ा – अ निल्हुस्ना व स – नकूलु लहू मिन् अम्रिना युस्रा (88)

और जो शख्स ईमान कुबूल करेगा और अच्छे काम करेगा तो (वैसा ही) उसके लिए अच्छे से अच्छा बदला है और हम बहुत जल्द उसे अपने कामों में से आसान काम (करने) को कहेंगे (88)

सुम् – म अत्ब – अ़ स – बबा (89)

फिर उस ने एक दूसरी राह एख्तियार की (89)

हत्ता इज़ा ब – ल – ग़ मत्लिअ़श्शम्सि व – ज – दहा तत्लुअु अ़ला कौ़मिल् – लम् नज्अ़ल् – लहुम् मिन् दूनिहा सितरा (90)

यहाँ तक कि जब चलते-चलते आफताब के तूलूउ होने की जगह पहुँचा तो (आफताब) से ऐसा ही दिखाई दिया (गोया) कुछ लोगों के सर पर उस तरह तुलूउ कर रहा है जिन के लिए हमने आफताब के सामने कोई आड़ नहीं बनाया था (90)

कज़ालि – क व क़द् अ – हत्ना बिमा लदैहि खुब्रा (91)

और था भी ऐसा ही और जुलक़रनैन के पास वो कुछ भी था हमको उससे पूरी वाकफ़ियत थी (91)

सुम् – म अत्ब – अ़ स – बबा (92)

(ग़रज़) उसने फिर एक और राह एख्तियार की (92)

हत्ता इज़ा ब – ल – ग बैनस्सद्दैनि व – ज – द मिन् दूनिहिमा कौमल् – ला यकादू – न यफ़्क़हू – न कौला (93)

यहाँ तक कि जब चलते-चलते रोम में एक पहाड़ के (कंगुरों के) दीवारों के बीचो बीच पहुँच गया तो उन दोनों दीवारों के इस तरफ एक क़ौम को (आबाद) पाया तो बात चीत कुछ समझ ही नहीं सकती थी (93)

कालू या ज़ल्करनैनि इन् – न यअ्जू – ज व मअ्जू – ज मुफ्सिदू – न फ़िल्अर्जि फ़ – हल् नज्अलु ल – क ख़र्जन् अ़ला अन् तज्अ़ – ल बैनना व बैनहुम् सद्दा (94)

उन लोगों ने मुतरज्जिम के ज़रिए से अर्ज़ की ऐ ज़ुलकरनैन (इसी घाटी के उधर याजूज माजूज की क़ौम है जो) मुल्क में फ़साद फैलाया करते हैं तो अगर आप की इजाज़त हो तो हम लोग इस ग़र्ज़ से आपसे पास चन्दा जमा करें कि आप हमारे और उनके दरमियान कोई दीवार बना दें (94)

का़ – ल मा मक्कन्नी फ़ीहि रब्बी खै़रून् फ़ – अअ़ीनूनी बिकुव्वतिन् अज्अ़ल् बैनकुम् व बैनहुम् रदमा (95)

जुलकरनैन ने कहा कि मेरे परवरदिगार ने ख़र्च की जो कुदरत मुझे दे रखी है वह (तुम्हारे चन्दे से) कहीं बेहतर है (माल की ज़रूरत नहीं) तुम फक़त मुझे क़ूवत से मदद दो तो मैं तुम्हारे और उनके दरमियान एक रोक बना दूँ (95)

आतूनी जु – बरल् – हदीदि , हत्ता इज़ा सावा बैनस्स – दफ़ैनि का़लन्फुखू हत्ता इज़ा ज – अ़ – लहू नारन् का – ल आतूनी उफ़्रिग् अ़लैहि कितरा (96)

(अच्छा तो) मुझे (कहीं से) लोहे की सिले ला दो (चुनान्चे वह लोग) लाए और एक बड़ी दीवार बनाई यहाँ तक कि जब दोनो कंगूरो के दरमेयान (दीवार) को बुलन्द करके उनको बराबर कर दिया तो उनको हुक्म दिया कि इसके गिर्द आग लगाकर धौको यहां तक उसको (धौंकते-धौंकते) लाल अंगारा बना दिया (96)

फ़ – मस्ताअू अंय्यज़्हरूहु व मस्तताअू लहू नक़्बा (97)

तो कहा कि अब हमको ताँबा दो कि इसको पिघलाकर इस दीवार पर उँडेल दें (ग़रज़) वह ऐसी ऊँची मज़बूत दीवार बनी कि न तो याजूज व माजूज उस पर चढ़ ही सकते थे और न उसमें नक़ब लगा सकते थे (97)

का – ल हाज़ा रह़्मतुम् – मिर्रब्बी फ़ – इज़ा – जा – अ वअ्दु रब्बी ज – अ़ – लहू दक्का – अ व का – न वअ्दु रब्बी हक़्क़ा (98)

जुलक़रनैन ने (दीवार को देखकर) कहा ये मेरे परवरदिगार की मेहरबानी है मगर जब मेरे परवरदिगार का वायदा (क़यामत) आयेगा तो इसे ढहा कर हमवार कर देगा और मेरे परवरदिगार का वायदा सच्चा है (98)

व तरक्ना बअ् – ज़हुम् यौमइजिंय्यमूजु फ़ी बअ्ज़िंव् – व नुफ़ि – ख़ फ़िस्सूरि फ़ – जमअ्नाहुम् जम्आ (99)

और हम उस दिन (उन्हें उनकी हालत पर) छोड़ देंगे कि एक दूसरे में (टकरा के दरिया की) लहरों की तरह गुड़मुड़ हो जाएँ और सूर फूँका जाएगा तो हम सब को इकट्ठा करेंगे (99)

व अ़रज्ना जहन्न – म यौमइज़िल् – लिल्काफ़िरी – न अरज़ा (100)

और उसी दिन जहन्नुम को उन काफिरों के सामने खुल्लम खुल्ला पेश करेंगे (100)

अल्लज़ी – न कानत् अअ्युनुहुम् फ़ी गिताइन् अन् ज़िक्री व कानू ला यस्ततीअू – न सम्आ (101)*

और उसी (रसूल की दुश्मनी की सच्ची बात) कुछ भी सुन ही न सकते थे (101)

अ – फ़ – हसिबल्लज़ी – न क – फ़रू अंय्यत्तख़िजू अिबादी मिन् दूनी औलिया – अ , इन्ना अअ्तद्ना जहन्न – म लिल्काफ़िरी – न नुजुला (102)

तो क्या जिन लोगों ने कुफ्र एख्तियार किया इस ख्याल में हैं कि हमको छोड़कर हमारे बन्दों को अपना सरपरस्त बना लें (कुछ पूछगछ न होगी) (अच्छा सुनो) हमने काफिरों की मेहमानदारी के लिए जहन्नुम तैयार कर रखी है (102)

कुल हल नुनब्बिउकुम् बिल् – अख़्सरी – न अअ्माला (103)

(ऐ रसूल) तुम कह दो कि क्या हम उन लोगों का पता बता दें जो लोग आमाल की हैसियत से बहुत घाटे में हैं (103)

अल्लज़ी – न ज़ल् – ल सअ्युहुम् फ़िल् – हयातिद्दुन्या व हुम् यह्सबू – न अन्नहुम् युह्सिनू – न सुन्आ (104)

(ये) वह लोग (हैं) जिन की दुनियावी ज़िन्दगी की राई (कोशिश सब) अकारत हो गई और वह उस ख़ाम ख्याल में हैं कि वह यक़ीनन अच्छे-अच्छे काम कर रहे हैं (104)

उलाइ – कल्लज़ी – न क – फ़रू बिआयाति रब्बिहिम् व लिका़इही फ़ – हबितत् अअ्मालुहुम् फ़ला नुकीमु लहुम् यौमल् – कियामति वज़्ना (105)

यही वह लोग हैं जिन्होंने अपने परवरदिगार की आयातों से और (क़यामत के दिन) उसके सामने हाज़िर होने से इन्कार किया तो उनका सब किया कराया अकारत हुआ तो हम उसके लिए क़यामत के दिन मीजान हिसाब भी क़ायम न करेंगे (105)

ज़ालि – क जज़ाउहुम् जहन्नमु बिमा क – फ़रू वत्त – ख़जू आयाती व रूसुली हुजुवा (106)

(और सीधे जहन्नुम में झोंक देगें) ये जहन्नुम उनकी करतूतों का बदला है कि उन्होंने कुफ्र एख्तियार किया और मेरी आयतों और मेरे रसूलों को हँसी ठठ्ठा बना लिया (106)

इन्नल्लज़ी – न आमनू व आ़मिलुस – सालिहाति कानत् लहुम् जन्नातुल – फ़िरदौसि नुजुला (107)

बेशक जिन लोगों ने ईमान क़ुबूल किया और अच्छे-अच्छे काम किये उनकी मेहमानदारी के लिए फिरदौस (बरी) के बाग़ात होंगे जिनमें वह हमेशा रहेंगे (107)

ख़ालिदी – न फ़ीहा ला यब्गू – न अ़न्हा हि – वला (108)

और वहाँ से हिलने की भी ख्वाहिश न करेंगे (108)

कुल् लौ कानल् – बहरू मिदादल लि – कलिमाति रब्बी ल – नफ़िदल् – बहरू क़ब् – ल अन् तन्फ़ – द कलिमातु रब्बी व लौ जिअ्ना बिमिस्लिही म – ददा (109)

(ऐ रसूल उन लोगों से) कहो कि अगर मेरे परवरदिगार की बातों के (लिखने के) वास्ते समन्दर (का पानी) भी सियाही बन जाए तो क़ब्ल उसके कि मेरे परवरदिगार की बातें ख़त्म हों समन्दर ही ख़त्म हो जाएगा अगरचे हम वैसा ही एक समन्दर उस की मदद को लाँए (109)

कुल् इन्नमा अ – न ब – शरूम् – मिस्लुकुम् यूहा इलय् – य अन्नमा इलाहुकुम् इलाहुंव् – वाहिदुन् फ़ – मन का – न यरजू लिका़ – अ रब्बिही फ़ल्यअ्मल् अ़ – मलन् सालिहंव् – व ला युश्रिक् बिअिबादति रब्बिही अ – हदा (110)*

(ऐ रसूल) कह दो कि मैं भी तुम्हारा ही ऐसा एक आदमी हूँ (फर्क़ इतना है) कि मेरे पास ये वही आई है कि तुम्हारे माबूद यकता माबूद हैं तो वो शख्स आरज़ूमन्द होकर अपने परवरदिगार के सामने हाज़िर होगा तो उसे अच्छे काम करने चाहिए और अपने परवरदिगार की इबादत में किसी को शरीक न करें (110)

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