सुलतान रुकनुद्दीन बैबर्स – भाग 1

Sultan Ruknuddin Baybars

सुलतान रुकनुद्दीन बैबर्स- मुस्लिम योद्धा जिसने मंगोलों को हराया

वह इस्लामी दुनिया के एक बहुत वीर और प्रसिद्ध सुलतान थे। उन्हें अरबी, तातरी, यूनानी जैसी अनगिनत भाषाओं का ज्ञान था। सुलतान बनने से पहले वह जगह-जगह एक गुलाम की हैसियत से धक्के खाते फिरे थे। इसलिए इस दौरान उन्होंने अलग-अलग भाषाओं में महारत हासिल कर ली थी।

समय ने कभी उसे चरवाहे के रूप में, चरागाह में भेड़-बकरियाँ चराते हुए देखा। आसमान ने कभी उसे दमिश्क शहर में गुलामो की मंडी में एक गुलाम की हैसियत से बिकते देखा। कभी उसने दमिश्क और मिस्र के हाकिमों की सेवा में समय बिताया। और एक बार सेना की छोटी टुकड़ी के साथ युद्ध के मैदान में देखा गया। और एक बार समय की पैनी नज़र ने उन्हें इस्लामी सेना के सरदार के रूप में देखा। एक मशहूर अमेरीकी लेखक इनके बारे में लिखते हैं, कि उसे अपने सिवा किसी पर विश्वास न था। इसलिए वह वेश बदलकर खुद पहरा लगाते और अपने लिए दुश्मनों को स्वयं सूचित किया करते थे। वह अपने साथियों को छोड़कर बिल्कुल अकेले निकल जाते। कभी मिस्र में नज़र आते, तो कभी अगले दिन फिलस्तीन में नज़र आते। चार दिन बाद लोग उन्हें अरब के रेगिस्तान में देखते और कुछ दिन बाद वह खानाबदोशों की गति से कहीं और लोगो को दिखाई देते।

जिस दिन वह इस्लामी दुनिया के सुल्तान बने, उन दिनों मंगोलों ने मुसलमानों पर हमला किया और उनके अधिकांश क्षेत्रों को नष्ट कर दिया। तथा हलाकू खाँन (मंगोल आक्रमणकारी चंगेज़ खाँन का पोता) मुसलमानों के इलाकों में बेखौफ घूमता था। एक बार सुलतान हलाकू की सल्तनत में मंगोल फौजी के रूप में बिल्कुल अकेला दाखिल हुआ। कई दिन के लगातार सफर के बाद वह हलाकू खाँन के इलाकों में दाखिल होने के बाद गाँव – गाँव, बस्ती-बस्ती उसके इलाकों की जासूसी करता रहा। क्योंकि उसे अलग-अलग भाषाओं का ज्ञान था, इसलिए किसी को उस पर शक न हुआ कि वह मुसलमान है या मुसलमानों का सुलतान।

एक दिन उसने मंगोलो के एक शहर में एक बावर्ची की दुकान पर खाना खाया और एक बर्तन में अपनी शाही अंगूठी उतार कर रख दी। इसके बाद वह अपने इलाके में वापस आ गया। और एक दूत हलाकू खाँन की तरफ भेजा और उससे कहलवाया, मैं तुम्हारी सल्तनत में हालात का जायज़ा करने के लिए उस जगह गया था। अमुक शहर में, फलां बावर्ची की दुकान पर अपनी शाही अंगूठी भूल आया। कृपया वह अंगूठी ढूंढ़ कर मुझे भिजवा दो। क्योंकि वह अंगूठी मुझे बहुत पसंद है। हलाकू खाँन मुसलमानों के सुलतान की बहादुरी से दंग रह गया। और उसकी बहादुरी से ऐसा खुश हुआ, कि उसकी अंगूठी ढूंढ़ कर उसको भिजवा दी। 

मंगोलो को जब पता लगा कि मुसलमानों का सुलतान खुद वेश बदलकर उनके इलाकों में दाखिल हुआ था। तो सुलतान के साहस और वीरता से मंगोल भयभीत हो गए। और वह सोचने लगे थे कि जिस सल्तनत का सुलतान इतना साहसी होगा, तो उसकी सेना कैसी होगी और हम उसका मुकाबला कैसे करेंगे। क्योंकि उन दिनों रोम के साथ-साथ पश्चिम के ईसाईयों ने अपने बड़े-बड़े सैन्य अड्डे बना लिए थे। जहाँ से निकलकर सलीबी मुसलमानों के खिलाफ युद्ध करते थे। 

उनमें से सबसे प्रसिद्ध अंताकिया का बादशाह बोहेमंड था। सुलतान एक बार एक ईसाई के रूप में ईसाईयों के इलाकों में जा दाखिल हुआ। और कई महीनों तक उन्होंने सैन्य किलो और अन्य महत्वपूर्ण स्थानों का निरीक्षण किया। वह लगभग ऐसे 22 किले देखने में कामयाब हो गए जो उन दिनों ईसाईयों की सैन्य शक्ति का केन्द्र थे। और ये सब काम सुलतान ने अकेले किया। उसके बाद उसने एक अजीब काम किया। उसने एक कासिद और राजदूत के रूप में जंगल में एक हिरण का शिकार किया और वह हिरण लेकर अंताकिया के बादशाह बोहेमंड के दरबार में जा दाखिल हुआ। और उसे वह शिकार देने के बाद कहने लगा, मुझे मिस्र के सुलतान अलमुल्कुज़्ज़ाहिर ने भेजा है। पता चला है आप शिकार का बहुत शौक रखते हैं इन दिनों शिकार के काबिल नहीं हैं, इसलिए उन्होंने ये ताज़ा शिकार बतौर उपहार भेजा है इसे कुबूल फरमाइये। मेरे आका आपके आभारी होंगे। 

कहते हैं कि सुलतान जब यह बात करने और शिकार अंताकिया के बादशाह के हवाले करने के बाद वहाँ से निकल गया। तो कुछ दिनों बाद अंताकिया के बादशाह को किसी ने बताया जो व्यक्ति तुम्हारे पास हिरण का शिकार लेकर आया था, वह तो खुद मुसलमानों का सुलतान था। यह सुनने के बाद नसरानियों के बादशाह बोहेमंड पर खौफ जारी हो गया था। ऐसे अविश्वसनीय कार्य को अंजाम देने वाला मिस्र का सुलतान रुकनुद्दीन बैबर्स था। 

सुलतान बैबर्स का कद लंबा था। उसके अंग बहुत अच्छे थे। यह अत्यधिक खुबसूरत था। चेहरे पर ऐसी वीरता जिससे दुश्मन दबा रहे। रंग सुर्ख (गहरा लाल रंग) और सफेद था, बाल सुर्ख और आँखें नीली थीं। कुछ लोग यह भी कहते हैं बचपन में जब वह गुलाम था तो उसकी एक आँख खराब हो गयी थी। तब भी सुलतान की खुबसूरती पर कोई असर न पड़ा। सुलतान बैबर्स का जन्म सन् 1223 ई. में मध्य एशिया में हुआ। उनके जन्म से कई वर्ष पहले ही बल्ख, बुखारा और समरकंद आदि के मुस्लिम व्यापारियों के प्रचार प्रयासों की बदौलत मध्य एशिया में इस्लाम फैल चुका था। 

बैबर्स एक मुस्लिम घराने में पैदा हुए। उनका नाम महमूद रखा गया। इनके पिता ख्वारज़्म शाही सल्तनत में एक ऊंचे पद पर बैठे हुए थे। बदकिस्मती से हुकमरान उनसे किसी बात पर नाराज़ हो गए और उन पर प्रतिबंध लगा दिया। इस प्रकार यह खुशहाल परिवार बुरे समय का शिकार हो गया। जब मंगोलों ने मुस्लिम इलाकों पर हमला करना शुरु किया। तो उन्होंने जवानों, बच्चों और औरतों को गुलामों के रूप में बेचना शुरु कर दिया। गुलामी के लिए पकड़े जाने वाले इन बच्चों में सुलतान बैबर्स भी शामिल था। सुलतान को भी दमिश्क की गुलामों की मंडी में बोली के लिए लाया गया।

पहली बार जिस व्यक्ति ने उसका सौदा किया उसके लिए उसने 100 दिरहम देने को कहा। लेकिन जब उसने देखा कि बच्चे की नीली आँखों में खराबी है तो उसने इस सौदे को रद्द कर दिया और सुलतान को खरीदने से इंकार कर दिया। सुलतान जिसका नाम बचपन में महमूद था आखिर जगह-जगह धक्के खाता फिरा। यहाँ तक की एक मिस्री सरदार ने उसे खरीद लिया। खरीदने वाले सरदार का नाम अली इब्नलबर्फा था। अली इब्नलबर्फा के ऊपर एक दूसरे मिस्री सरदार का कर्ज़ था। अली इब्नलबर्फा ने अपने कर्ज़ के बदले महमूद को मिस्री सरदार को दे दिया। 

सरदार जिसने महमूद को खरीदा था। उसकी पत्नी ने अपने छोटे बच्चे की देखभाल महमूद के ऊपर सौंप दी। बदकिस्मती से एक दिन महमूद से कोई गलती हो गई। इस पर उसकी मालकिन ने उसे मार-मार कर अधमरा कर दिया और उसे बुरी तरह से पीटा। इस मौके पर सरदार की बहन भी वहाँ पर मौजूद थी जिसका नाम फातिमा था। उसने जब महमूद को पिटते हुए देखा तो उसको उ स लावारिस और गुलाम बच्चे पर बड़ी दया आई। उसने बड़ी सख्ती से अपनी भाभी को कहा कि अगर तुम इस गुलाम के काम से खुश नहीं हो तो उसको मुझे सौंप दो।

वह औरत मान गई और फातिमा महमूद को अपने साथ दमिश्क ले गई। जहाँ उसका घर था। फातिमा का अपना एक बड़ा बेटा था, जो मर गया था। और इत्तेफाक से उस मरने वाले का चेहरा महमूद से मिलता-जुलता था। इस पर फातिमा ने उसे अपने बेटे की हैसियत से अपने पास रख लिया। और वह महमूद के बजाय उसे बैबर्स कहकर बुलाने लगी। फातिमा बाबर को मां की तरह मानती थी उसका बहुत ध्यान रखती थी। जिस तरह अपने बेटे का ख्याल रखती थी। उसी तरह बैबर्स का भी खूब ख्याल रखती थी।

इस फातिमा नाम की औरत का एक भाई था जो मिस्र के सुलतान अलमुल्कुस सालेह नजमुद्दीन अय्यूब के दरबार में एक बड़े पद पर था। एक बार वह अपनी बहन ले मिलने के लिए दमिश्क आया। तो वहाँ उसने बैबर्स को देखा। उसके हालात सुने। लड़के की ईमानदारी, उसकी आदत उसे इतनी पसंद आयी कि उसने प्रार्थना के अंदाज़ में फातिमा से बैबर्स को माँग लिया। फातिमा ने बैबर्स को अपने भाई के हवाले कर दिया। उसका भाई बैबर्स को दमिश्क से काहिरा ले गया और वहाँ उसने बैबर्स को मिस्र के सुलतान अलमुल्कुस सालेह को सौंप दिया।

सुलतान अलमुल्कुस सालेह ने बैबर्स के अलावा और बहुत से लावारिस बच्चों को खरीद रखा था। और उनकी पड़ाई-लिखाई के लिए विशेष व्यवस्था की थी। बैबर्स ने भी अलमुल्कुस सालेह के संरक्षण में किताबी ज्ञान और युद्ध संबंधी ज्ञान में उच्च शिक्षा हासिल की। इसके बाद वह मिस्री सेना में शामिल हो गया। अपनी शारीरिक शक्ति, बुद्धिमानी और प्रतिष्ठा की वजह से सेना की एक टुकड़ी का सरदार नियुक्त कर दिया गया। उस समय तक उसनें कोई खास पद हासिल न किया था।

संयोग से उसी ज़माने में सातवीं सलीबी जंग की शुरुआत हो गई। सातवीं सलीबी जंग की शुरुआत फ्राँस के बादशाह लूई मैहम ने की थी। उसने अपने काम की शुरुआत मिस्र पर आक्रमण करके किया। वह चाहता था कि आगे बढ़कर पूरे फिलस्तीन पर कब्ज़ा कर ले। जिन दिनों फ्राँस का बादशाह मिस्र पर आक्रमण करना चाहता था। उन दिनों मिस्र का सुलतान अलमुल्कुस सालेह था। जिस समय फ्राँस के बादशाह ने मिस्र पर आक्रमण किया, उस समय मिस्र के सुलतान अलमुल्कुस सालेह बुरी तरह बुखार में थे, बीमार थे अतः कोई गतिविधि नहीं कर सकते थे। उस हालात में भी वह मंसूरा के मैदान में फ्राँसीसियों के सामने आये। उनकी पत्नी सजरतुद्दर उस मौके पर उनके साथ थीं। क्योंकि सुलतान बीमार थे। सजरतुद्दर एक बहुत ही बद्धिमान, बुलंद हौसला और बहादुर औरत थीं। जिन दिनों लूई मैहम मिस्र देश में दाखिल हुआ उन दिनों मिस्र के सुलतान अलमुल्कुस सालेह की मृत्यु हो गयी थी।

क्योंकि फ्राँसीसी आक्रमण हो चुका था इसलिए सजरतुद्दर ने सुलतान की मौत की खबर किसी को न दी। और उसके बेटे तौरान शाह को जो उस समय ‘हिस्ने तहीफा’ में था। मंसूरा के मैदान में बुला लिया। यह सजरतुद्दर का बड़ा हौसला था। तौरान शाह सुलतान का बेटा था लेकिन उसकी दूसरी पत्नी से था। सजरतुद्दर का सौतेला बेटा था। अपनी सौतेली माँ के बुलाने पर तौरान शाह मंसूरा पहुँच गया। मंसूरा में फ्राँसीसियों के साथ युद्ध हुआ। जिस समय फ्राँसीसी और मिस्री सेना एक-दूसरे से टकरा रहीं थीं उस समय लोगों ने देखा कि अरबी घोड़े पर सवार एक अत्यंत सुंदर युवक ईसाईयों की सेना में अपना भाला लहराते हुए हमला कर रहा था और अपने पीछे दुश्मन की लाशों के ढेर लगाता जा रहा था।

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